डूंगरपुर दुष्कर्म-हत्या मामले में बड़ा फैसला: फांसी की सजा बदली, अब “शेष प्राकृतिक जीवन तक आजीवन कारावास”
राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर मुख्यपीठ ने डूंगरपुर जिले में 10 वर्षीय मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के गंभीर मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा दोषी को दी गई फांसी की सजा को संशोधित करते हुए उसे “शेष प्राकृतिक जीवन तक आजीवन कारावास” में बदल दिया है।
यह फैसला हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा शामिल थे, ने सुनाया। अदालत ने विशेष POCSO कोर्ट द्वारा आरोपी जितेंद्र उर्फ जीतू को दी गई मृत्युदंड की सजा पर पुनर्विचार करते हुए यह संशोधन किया।
मामला डूंगरपुर जिले में एक 10 वर्षीय बच्ची के साथ हुई जघन्य वारदात से जुड़ा है, जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था। विशेष POCSO कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड, साक्ष्यों और ट्रायल कोर्ट के निर्णय का विस्तृत अध्ययन किया। इसके बाद अदालत ने सजा के स्वरूप में संशोधन करते हुए यह माना कि फांसी की सजा के बजाय दोषी को जीवनभर जेल में रखना न्याय के उद्देश्य को पूरा करेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोषी अब अपने पूरे प्राकृतिक जीवन तक जेल में ही रहेगा और उसे किसी भी प्रकार की समयपूर्व रिहाई का लाभ नहीं मिलेगा।
यह निर्णय न्यायिक व्यवस्था में “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मामलों में सजा के निर्धारण और उसके अनुपात पर फिर से चर्चा को जन्म देता है। अदालत के इस फैसले के बाद कानूनी विशेषज्ञों के बीच भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे संतुलित न्याय बताते हैं, जबकि कुछ का मानना है कि ऐसे मामलों में मृत्युदंड ही उचित था।
वहीं पीड़िता के परिवार की ओर से इस फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आई है। परिवार का कहना है कि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा है, लेकिन बच्ची के साथ हुई घटना को देखते हुए वे कठोरतम सजा की उम्मीद कर रहे थे।
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ मजबूत साक्ष्य और गवाह पेश किए थे, जिसके आधार पर निचली अदालत ने उसे दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने सजा के स्वरूप में बदलाव करते हुए आजीवन कारावास के कठोर स्वरूप को बरकरार रखा है।
इस फैसले के बाद राज्य में एक बार फिर बाल सुरक्षा और POCSO कानून के तहत मामलों में सजा के मानकों पर बहस तेज हो सकती है। कानून विशेषज्ञों का कहना है कि “शेष प्राकृतिक जीवन तक आजीवन कारावास” का मतलब यह है कि दोषी को जीवन भर जेल में ही रहना होगा और उसकी रिहाई की संभावना बेहद सीमित रहती है।
फिलहाल यह फैसला प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है और कानूनी जगत इस पर गहन मंथन कर रहा है।
