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शहरी निकायों में स्व-निधि और आवास योजना का लाभ नहीं मिल रहा, सिर्फ 36% को ही मिला लोन

 
शहरी निकायों में स्व-निधि और आवास योजना का लाभ नहीं मिल रहा, सिर्फ 36% को ही मिला लोन

देशभर के शहरी निकायों में प्रधानमंत्री स्व-निधि योजना और आवास योजना के तहत लाभार्थियों को मिलने वाले लोन में बड़ी कमी देखने को मिली है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, योजना के तहत आवेदन करने वाले केवल 36% लोगों को ही लोन मिल पाया है। इस रिपोर्ट ने योजना के क्रियान्वयन में कई कमियों को उजागर कर दिया है।

स्व-निधि और आवास योजना का उद्देश्य शहरी गरीबों, छोटे व्यवसायियों और मध्यम वर्ग को वित्तीय सहायता प्रदान करना है। इसके तहत लाभार्थियों को आसान शर्तों पर लोन दिया जाता है, ताकि वे अपने छोटे व्यवसाय या आवास संबंधी जरूरतों को पूरा कर सकें। लेकिन हाल के आंकड़े बताते हैं कि योजना का वास्तविक लाभ बहुत ही सीमित लोगों तक ही पहुंच पाया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि शहरी निकायों में योजना के क्रियान्वयन में कई तरह की बाधाएँ हैं। इनमें आवेदन प्रक्रिया की जटिलताएँ, दस्तावेज़ों की कमी, समय पर समीक्षा न होना और कई बार प्रशासनिक लापरवाही प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा, कई बार पात्र लोगों को उनके अधिकार और आवेदन प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं मिल पाती, जिससे लाभ मिलने में देरी होती है या लाभ ही नहीं मिलता।

सरकारी रिपोर्ट में बताया गया है कि स्व-निधि योजना में अब तक लगभग 36% आवेदन ही मंजूर हो पाए हैं, जबकि शेष 64% आवेदन विभिन्न कारणों से लंबित हैं या रद्द किए गए हैं। आवास योजना में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। कई शहरी निकायों में लाभार्थियों को लोन देने की प्रक्रिया धीमी होने के कारण योजना का उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा है।

शहरी निकायों के अधिकारी इस स्थिति के लिए तकनीकी और प्रशासनिक बाधाओं को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि योजना का डाटा अपडेट करना, आवेदन की जांच करना और लोन प्रोसेसिंग समय लेने वाला कार्य है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि योजना की प्रक्रिया को सरल बनाया जाए और डिजिटल माध्यमों का अधिक प्रभावी उपयोग किया जाए, तो अधिक लाभार्थियों तक लाभ पहुंचाया जा सकता है।

लाभार्थियों का कहना है कि उन्हें अक्सर योजना के आवेदन और लोन प्रोसेसिंग के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती। कई लोग महीनों तक आवेदन के परिणाम का इंतजार करते रहते हैं। इसके चलते योजना की विश्वसनीयता और लाभ की पहुंच पर प्रश्न उठने लगे हैं।