झुंझुनूं में बढ़ रहा राजस्थानी ‘कुंकुं पतरी’ का चलन, मायड़ बोली में शादी कार्ड बन रहे नई पहचान
आधुनिकता के दौर में जहां शादी-ब्याह के निमंत्रण पत्रों में अंग्रेजी और हिंदी का वर्चस्व रहा है, वहीं अब धीरे-धीरे राजस्थानी भाषा में छपने वाले पारंपरिक ‘कुंकुं पतरी’ का चलन भी रफ्तार पकड़ता नजर आ रहा है। जिले में लोग अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटते हुए मायड़ बोली में शादी के कार्ड छपवाने में रुचि दिखा रहे हैं।
स्थानीय प्रिंटिंग प्रेस संचालक आर्यन शर्मा के अनुसार, पहले बहुत कम लोग ही राजस्थानी भाषा में निमंत्रण पत्र छपवाने आते थे, लेकिन अब इसमें स्पष्ट रूप से बढ़ोतरी देखी जा रही है। खासकर युवाओं और शिक्षित परिवारों में अपनी भाषा और परंपरा को लेकर जागरूकता बढ़ी है, जिसका असर शादी के कार्ड्स में भी दिखाई दे रहा है।
उन्होंने बताया कि ‘कुंकुं पतरी’ केवल एक निमंत्रण पत्र नहीं, बल्कि राजस्थानी संस्कृति और परंपरा का प्रतीक है। इसमें इस्तेमाल होने वाली भाषा, शब्दावली और शैली पूरी तरह स्थानीय होती है, जो रिश्तों और सामाजिक भावनाओं को विशेष रूप से दर्शाती है।
ग्राहकों का कहना है कि मायड़ बोली में छपे कार्ड्स से न केवल अपनी पहचान को मजबूती मिलती है, बल्कि यह मेहमानों के लिए भी खास आकर्षण का केंद्र बनते हैं। ऐसे कार्ड्स को लोग संजोकर रखते हैं, क्योंकि इनमें एक अलग अपनापन और सांस्कृतिक जुड़ाव महसूस होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल एक ट्रेंड नहीं, बल्कि अपनी भाषा और संस्कृति को संरक्षित करने की दिशा में एक सकारात्मक पहल है। डिजिटल युग में जहां परंपराएं धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं, वहीं इस तरह के प्रयास उन्हें जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
फिलहाल, झुंझुनूं में राजस्थानी ‘कुंकुं पतरी’ की बढ़ती मांग यह संकेत दे रही है कि लोग आधुनिकता के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को भी संजोए रखना चाहते हैं।
