झुंझुनूं में पराली बनी कमाई और बिजली का जरिया, कृषि अवशेषों से तैयार हो रही ऊर्जा
झुंझुनूं जिले में खेती के बाद बचने वाली पराली और कृषि अवशेष, जिन्हें आमतौर पर किसानों और पर्यावरण के लिए बड़ी समस्या माना जाता है, अब ऊर्जा और रोजगार का बड़ा स्रोत बन रहे हैं। जिले के मंड्रेला रोड पर स्थापित आधुनिक बायोमास पावर प्लांट में पराली और अन्य कृषि वेस्टेज से बड़े पैमाने पर बिजली तैयार की जा रही है।
यह प्लांट न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम कदम साबित हो रहा है, बल्कि किसानों के लिए अतिरिक्त आय का जरिया भी बन गया है। पहले जिन कृषि अवशेषों को किसान खेतों में जलाने को मजबूर थे, अब वही सामग्री सीधे पावर प्लांट तक पहुंचाई जा रही है।
जानकारी के अनुसार प्लांट में सरसों, बाजरा, गेहूं और अन्य फसलों की बची पराली व कृषि कचरे का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इन अवशेषों से बॉयलर के जरिए ऊर्जा तैयार कर बिजली उत्पादन किया जा रहा है। इससे खेतों में पराली जलाने की घटनाओं में भी कमी आने लगी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पराली जलाने से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है और वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ता है। ऐसे में बायोमास पावर प्लांट जैसी पहल पर्यावरण संरक्षण के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिल रही है।
इस परियोजना का सबसे बड़ा फायदा किसानों को हो रहा है। अब किसानों को कृषि अवशेषों के बदले भुगतान मिल रहा है, जिससे उनकी अतिरिक्त आमदनी बढ़ रही है। पहले खेत साफ करने के लिए किसानों को खर्च करना पड़ता था, लेकिन अब वही पराली कमाई का साधन बन गई है।
स्थानीय लोगों के अनुसार पावर प्लांट से रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। बड़ी संख्या में युवाओं को प्लांट और परिवहन कार्यों में रोजगार मिला है। ग्रामीण क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियां बढ़ने से आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिली है।
विशेषज्ञ इसे राजस्थान में हरित ऊर्जा की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं। सरकार भी कृषि अवशेषों के बेहतर उपयोग और प्रदूषण नियंत्रण को लेकर इस तरह की परियोजनाओं को बढ़ावा दे रही है।
झुंझुनूं का यह मॉडल अब दूसरे जिलों के लिए भी प्रेरणा बनता जा रहा है। जिस पराली को कभी समस्या माना जाता था, वही अब ऊर्जा उत्पादन, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत माध्यम बन चुकी है।
