"8 साल की उम्र में पापा ने अखाड़े भेजा, लड़कों को हराया तो बढ़ा आत्मविश्वास"
"मैं जब सिर्फ 8 साल की थी, तभी पापा ने मुझे रेसलिंग सीखने के लिए कोच के पास भेज दिया। शुरुआत में वहां लड़के ही ज्यादा अभ्यास करते थे और कोच भी मेरी कुश्ती लड़कों से ही करवाते थे। पहले थोड़ी झिझक होती थी, लेकिन धीरे-धीरे मैंने खुद को साबित करना शुरू किया। जब मैं लड़कों को हराने लगी तो मेरे अंदर आत्मविश्वास बढ़ता गया और मुझे यकीन हो गया कि मेहनत और हौसले के आगे कोई फर्क मायने नहीं रखता।
हम चार बहनें हैं और हममें से तीन ने रेसलिंग को अपना करियर चुना। हमारी इस यात्रा में सबसे बड़ा योगदान हमारे पापा का रहा। उन्होंने कभी हमें बेटियों के रूप में कमजोर नहीं समझा। उन्होंने हमेशा कहा कि बेटियां भी वही कर सकती हैं, जो बेटे कर सकते हैं।
समाज की कई बातें और लोगों के ताने भी सुनने पड़े, लेकिन पापा ने कभी हमारा हौसला नहीं टूटने दिया। उन्होंने हर कदम पर हमारा साथ दिया और हमें अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित किया। उनकी सोच हमेशा यही रही कि बेटियों को अवसर मिलेगा, तभी वे अपनी पहचान बना पाएंगी।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो महसूस होता है कि अगर पापा ने उस समय मुझ पर भरोसा नहीं किया होता, तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाती। लड़कों के साथ अभ्यास करने से न केवल मेरी तकनीक मजबूत हुई, बल्कि मानसिक रूप से भी मैं पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बनी।
मेरी सफलता सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि उन सभी बेटियों की सफलता है, जिनके परिवार उन पर विश्वास करते हैं। मैं चाहती हूं कि हर माता-पिता अपनी बेटियों को भी सपने देखने और उन्हें पूरा करने का मौका दें। अगर परिवार का साथ मिले तो बेटियां हर क्षेत्र में देश और समाज का नाम रोशन कर सकती हैं।"
