जालोर के प्रमुख विरासत स्थलों पर संरक्षण कार्य धीमा, बढ़ रहा नुकसान का खतरा
जिले के तीन प्रमुख ऐतिहासिक और विरासत स्थलों—जालोर दुर्ग, तोपखाना और भाद्राजून की छतरियों—में संरक्षण कार्य की धीमी गति को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। इन सभी संरचनाओं में समय के साथ क्षति बढ़ रही है, जिससे उनकी ऐतिहासिक धरोहर पर खतरा मंडराने लगा है।
यह सभी स्मारक राजस्थान पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के अधीन हैं, जहां संरक्षण और मरम्मत कार्य चल रहा है, लेकिन इसकी गति बेहद धीमी बताई जा रही है। स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों का कहना है कि यदि जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो इन धरोहरों को और अधिक नुकसान हो सकता है।
जालोर दुर्ग, जो क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान का प्रतीक माना जाता है, वहां कई स्थानों पर दीवारों का प्लास्टर झड़ने लगा है और संरचना कमजोर होती जा रही है। इसी तरह तोपखाने और भाद्राजून की छतरियों में भी मरम्मत और देखरेख की कमी साफ दिखाई दे रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर संरक्षण कार्य न होने से नमी, मौसम और प्राकृतिक प्रभाव इन संरचनाओं को तेजी से नुकसान पहुंचा रहे हैं। इससे न केवल उनकी मजबूती प्रभावित हो रही है, बल्कि ऐतिहासिक महत्व भी खतरे में पड़ रहा है।
स्थानीय नागरिकों ने पुरातत्व विभाग से मांग की है कि इन स्मारकों के संरक्षण कार्य को तेज किया जाए और नियमित रखरखाव सुनिश्चित किया जाए। उनका कहना है कि ये स्थल पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं, इसलिए इनका संरक्षण आवश्यक है।
फिलहाल विभागीय स्तर पर मरम्मत कार्य जारी है, लेकिन उसकी धीमी रफ्तार को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लोगों को उम्मीद है कि जल्द ही इस दिशा में ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएंगे, ताकि यह ऐतिहासिक धरोहरें सुरक्षित रह सकें।
