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भणियाणा में पालीवालों के बनाए प्राचीन कुएं-बावड़ियां जर्जर, देखभाल के अभाव में ऐतिहासिक जल स्रोतों पर संकट

 
भणियाणा में पालीवालों के बनाए प्राचीन कुएं-बावड़ियां जर्जर, देखभाल के अभाव में ऐतिहासिक जल स्रोतों पर संकट

जैसलमेर जिले के भणियाणा क्षेत्र में पालीवाल समाज की ओर से सदियों पहले बनाए गए प्राचीन कुएं और बावड़ियां अब देखरेख के अभाव में जर्जर होती जा रही हैं। कभी ये जल स्रोत ग्रामीणों और राहगीरों के लिए पानी का प्रमुख सहारा हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ इनकी स्थिति खराब होती गई। वर्तमान में इन ऐतिहासिक जल स्रोतों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है।

क्षेत्र में पानी की समस्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में पुराने कुएं और बावड़ियां उपयोगी साबित हो सकती हैं, लेकिन इनके संरक्षण और रखरखाव की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कई स्थानों पर जल स्रोतों के आसपास गंदगी और झाड़ियां उग आई हैं, जबकि कुछ संरचनाओं के पत्थर और अन्य हिस्से भी क्षतिग्रस्त हो रहे हैं।

जल संरक्षण की मिसाल थे पालीवालों के जल स्रोत

भणियाणा क्षेत्र में पालीवालों द्वारा बनाए गए कुएं और बावड़ियां उस दौर की जल प्रबंधन व्यवस्था की मिसाल मानी जाती हैं। रेगिस्तानी इलाके में पानी की उपलब्धता हमेशा बड़ी चुनौती रही है। ऐसे में इन जल स्रोतों का निर्माण स्थानीय लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया था।

इन कुओं और बावड़ियों की वास्तुकला भी ऐतिहासिक महत्व रखती है। इनका निर्माण उस समय की तकनीक और जल संरक्षण की समझ को दर्शाता है। यही वजह है कि इन संरचनाओं को केवल पानी के स्रोत के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत के तौर पर भी देखा जाता है।

पानी का संकट, फिर भी रखरखाव नहीं

भणियाणा क्षेत्र में गर्मी और कम वर्षा के कारण पानी की समस्या लोगों के सामने बनी रहती है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्राचीन जल स्रोतों का संरक्षण और जीर्णोद्धार किया जाए तो इन्हें दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, कई कुएं और बावड़ियां लंबे समय से उपेक्षित हैं। समय रहते इनकी मरम्मत नहीं की गई तो ऐतिहासिक संरचनाएं पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन और संबंधित विभाग से इन जल स्रोतों का सर्वे करवाकर संरक्षण और जीर्णोद्धार कराने की मांग की है।

विरासत बचाने की जरूरत

स्थानीय लोगों का कहना है कि प्राचीन कुएं और बावड़ियां क्षेत्र की पहचान और इतिहास से जुड़ी हुई हैं। इनके संरक्षण से एक ओर ऐतिहासिक विरासत बचाई जा सकती है, वहीं दूसरी ओर जल संकट के दौर में पुराने जल स्रोतों को उपयोगी बनाया जा सकता है।

अब जरूरत है कि प्रशासन इन ऐतिहासिक जल संरचनाओं की स्थिति का आकलन करे और इनके संरक्षण के लिए ठोस योजना तैयार करे। समय पर कदम नहीं उठाया गया तो पालीवालों की यह प्राचीन जल विरासत धीरे-धीरे खत्म हो सकती है।