अजमेर शरीफ दरगाह की ये खास बातें शायद नहीं जानते होंगे आप, ख्वाजा गरीब नवाज के दर पर सदियों से पहुंच रहे जायरीन
राजस्थान का अजमेर शहर ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक आस्था के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यहां स्थित अजमेर शरीफ दरगाह को ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के रूप में जाना जाता है। यह स्थान सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार दरगाह भारत के प्रमुख सूफी धार्मिक स्थलों में शामिल है और यहां अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग पहुंचते हैं।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती से जुड़ा है इतिहास
अजमेर शरीफ दरगाह में सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की मजार स्थित है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार ख्वाजा साहब फारस से भारत आए और लाहौर के रास्ते अजमेर पहुंचे। उन्होंने वर्ष 1192 से लेकर 1236 ईस्वी में अपने निधन तक अजमेर को अपनी कर्मभूमि बनाया। उनकी शिक्षाओं में प्रेम, सेवा और मानवता को विशेष महत्व दिया गया।
समय के साथ ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अजमेर की पहचान बनती चली गई। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार मुगल बादशाह हुमायूं ने ख्वाजा साहब के सम्मान में दरगाह का निर्माण कराया। इसके बाद मुगल सम्राट अकबर और शाहजहां ने भी दरगाह परिसर में निर्माण कार्य करवाए। अकबर के समय अजमेर की धार्मिक महत्ता और भी बढ़ी तथा वे यहां नियमित रूप से तीर्थ यात्रा के लिए आते थे।
तीन प्रमुख दरवाजों से होती है प्रवेश की पहचान
अजमेर शरीफ दरगाह की वास्तुकला भी अपने आप में खास है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार दरगाह परिसर के प्रमुख प्रवेश द्वारों में निजाम गेट, शाहजहां गेट और बुलंद दरवाजा शामिल हैं। मुख्य परिसर में ख्वाजा साहब की मजार स्थित है, जिसे संगमरमर की जाली और चांदी की रेलिंग से घेरा गया है। परिसर में मुगल काल से जुड़ी मस्जिदें भी मौजूद हैं।
बड़ी देग और लंगर की परंपरा
दरगाह शरीफ में बड़ी देगों में भोजन तैयार करने की परंपरा भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार यहां बड़ी देगों में भोजन तैयार किया जाता है और श्रद्धालुओं के बीच इसे प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। यह परंपरा दरगाह से जुड़ी सामुदायिक सेवा और धार्मिक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
उर्स में उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब
अजमेर शरीफ दरगाह में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की याद में होने वाला उर्स धार्मिक कैलेंडर का महत्वपूर्ण आयोजन है। इस दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में जायरीन अजमेर पहुंचते हैं। श्रद्धालु दरगाह में चादर और फूल पेश करते हैं तथा दुआ करते हैं।
दरगाह की लोकप्रियता केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। अजमेर की सांस्कृतिक और पर्यटन पहचान में भी इसका बड़ा योगदान है। राजस्थान पर्यटन विभाग अजमेर शरीफ को शहर के सबसे प्रसिद्ध और अधिक देखे जाने वाले स्थलों में शामिल करता है।
सदियों बाद भी कायम है आस्था
आज अजमेर शरीफ दरगाह इतिहास, सूफी परंपरा और धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई है। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की शिक्षाओं से जुड़ी मानव सेवा और प्रेम की परंपरा ने इस स्थान को विशेष पहचान दी है। यही वजह है कि सदियों बाद भी अजमेर शरीफ देश और दुनिया के श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
