राजस्थान में ‘मनुहार’ की परंपरा आधुनिकता के दबाव में बदलती कुरीति, अफीम अब स्टेटस सिंबल
राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत में ‘मनुहार’ का विशेष स्थान है। मेवाड़ हो या मारवाड़, यह परंपरा सदियों से समाज में स्वागत और सम्मान का प्रतीक रही है। लेकिन आधुनिकता और दिखावे की अंधी दौड़ ने इस पारंपरिक रीति को एक घातक कुरीति में बदल दिया है।
भीलवाड़ा और आसपास के जिलों में शादी-ब्याह, उत्सव और मृत्युभोज जैसे अवसरों पर अब अफीम घोलना केवल नशे का साधन नहीं रहा, बल्कि इसे एक ‘स्टेटस सिंबल’ के रूप में देखा जाने लगा है। परिवार और मेहमान इसे शोहरत और धन-दौलत का प्रतीक मानने लगे हैं।
सांस्कृतिक विशेषज्ञों का कहना है कि मनुहार की इस परंपरा का मूल उद्देश्य आदर, सत्कार और समाजिक एकता बनाए रखना था। लेकिन समय के साथ इसे भौतिक प्रदर्शन और सामाजिक दबाव का माध्यम बना दिया गया है। इससे स्वास्थ्य और सामाजिक दृष्टि से कई समस्याएं पैदा हो रही हैं।
स्थानीय लोग और समाजकर्मी इस प्रवृत्ति से चिंतित हैं। उनका कहना है कि अफीम जैसी नशीली चीजों का मनुहार में प्रयोग युवाओं और आम लोगों में नशे की आदत को बढ़ावा देता है और समाज में हिंसा और अपराध जैसी घटनाओं की संभावना भी बढ़ जाती है।
विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि मनुहार की परंपरा को अपनी मूल गरिमा में वापस लाया जाए। इसके लिए समाज और परिवारों को शिक्षा और जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। पारंपरिक रीति-रिवाजों में स्वागत और सम्मान के प्रतीक के रूप में खाद्य-सामग्री और फूलों का इस्तेमाल करना अधिक सुरक्षित और सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त रहेगा।
भीलवाड़ा और आसपास के क्षेत्र में यह मुद्दा धीरे-धीरे सामाजिक चर्चा का विषय बन रहा है। जागरूक नागरिक और संगठन अब इस परंपरा में नशे के इस्तेमाल को रोकने और संस्कृति को बचाने के लिए कदम उठा रहे हैं। यह प्रयास न केवल परंपरा को संरक्षित करने में मदद करेगा, बल्कि सामाजिक स्वास्थ्य और सुरक्षा को भी सुनिश्चित करेगा।
