औद्योगिक विकास की कीमत, ‘वस्त्रनगरी’ बनती जा रही ‘प्रदूषणनगरी’, धूल-धुएं से घुट रही शहर की सांसें
अपनी समृद्ध औद्योगिक पहचान और वस्त्र उद्योग के लिए मशहूर ‘वस्त्रनगरी’ अब धीरे-धीरे ‘प्रदूषणनगरी’ में तब्दील होती नजर आ रही है। औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण मानकों की लगातार अनदेखी शहरवासियों के स्वास्थ्य पर भारी पड़ने लगी है। हालात यह हैं कि कभी ताजी हवा और स्वच्छ वातावरण के लिए पहचाना जाने वाला यह शहर अब धूल और धुएं की चादर में लिपटा नजर आता है।
शहर की सुबह, जो पहले पक्षियों की चहचहाहट और ठंडी हवा के झोंकों से शुरू होती थी, अब धूल के गुबारों और प्रदूषण भरी हवा के साथ हो रही है। सड़कों पर उड़ती धूल, फैक्ट्रियों से निकलता धुआं और लगातार बढ़ते वाहनों का दबाव वातावरण को जहरीला बना रहा है। इसका सीधा असर आमजन के स्वास्थ्य पर दिखाई दे रहा है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि बीते कुछ वर्षों में औद्योगिक इकाइयों की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन प्रदूषण नियंत्रण के उपाय उसी अनुपात में नहीं किए गए। कई फैक्ट्रियां बिना पर्याप्त फिल्टर और ट्रीटमेंट प्लांट के धुआं और अपशिष्ट खुले में छोड़ रही हैं। इससे हवा के साथ-साथ जल स्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं। आसपास के इलाकों में गंदा पानी और रासायनिक कचरा चिंता का विषय बना हुआ है।
डॉक्टरों के अनुसार, शहर में सांस संबंधी बीमारियों के मरीजों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। अस्थमा, एलर्जी, खांसी और आंखों में जलन जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। खासकर बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।
पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि संबंधित विभागों द्वारा समय-समय पर निरीक्षण तो किए जाते हैं, लेकिन सख्त कार्रवाई के अभाव में नियमों की अनदेखी जारी है। प्रदूषण नियंत्रण के नियम केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं। शहर में हरियाली भी तेजी से घट रही है, जिससे प्रदूषण का स्तर और बढ़ रहा है।
स्थानीय सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से ठोस कदम उठाने की मांग की है। उनका कहना है कि फैक्ट्रियों में आधुनिक प्रदूषण नियंत्रण उपकरण अनिवार्य किए जाएं, नियमित जांच हो और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही, शहर में अधिक से अधिक पौधारोपण और स्वच्छता अभियान चलाने की जरूरत है।
स्पष्ट है कि औद्योगिक विकास जरूरी है, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं। यदि समय रहते संतुलन नहीं साधा गया, तो ‘वस्त्रनगरी’ की पहचान धूमिल होकर ‘प्रदूषणनगरी’ के नाम से जानी जाने लगेगी। अब जरूरत है जिम्मेदारी और जागरूकता के साथ विकास की राह चुनने की, ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण मिल सके।
