Aapka Rajasthan

मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट की बड़ी चूक, फुटेज में जानें सम्मान के अगले ही दिन नोटिस, प्राइवेट व्यक्ति को भी किया सम्मानित

मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट की बड़ी चूक, फुटेज में जानें सम्मान के अगले ही दिन नोटिस, प्राइवेट व्यक्ति को भी किया सम्मानित
 
मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट की बड़ी चूक, फुटेज में जानें सम्मान के अगले ही दिन नोटिस, प्राइवेट व्यक्ति को भी किया सम्मानित

मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट से जुड़ा एक हैरान करने वाला और विवादास्पद मामला सामने आया है, जिसने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विभाग ने जिन सरकारी हॉस्पिटलों के अधीक्षकों और प्रभारी डॉक्टरों को उल्लेखनीय सेवाओं के लिए सम्मानित किया, उन्हीं अधिकारियों को अगले ही दिन खराब कार्यप्रणाली और लापरवाही के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी कर दिए गए। इस पूरे घटनाक्रम ने विभागीय स्तर पर तालमेल और मूल्यांकन प्रक्रिया की पोल खोल दी है।

जानकारी के अनुसार 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट की ओर से कुछ हॉस्पिटलों के अधीक्षकों और प्रभारियों को उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया था। इन डॉक्टरों को प्रशस्ति पत्र देकर उनके कार्यों की सराहना की गई। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि सम्मान समारोह के ठीक अगले दिन ही इन्हीं में से कई अधिकारियों को उनके कामकाज में गंभीर खामियों को लेकर कारण बताओ नोटिस थमा दिए गए।

विभागीय सूत्रों के अनुसार, जिन डॉक्टरों को नोटिस जारी किए गए हैं, उन पर हॉस्पिटल संचालन में लापरवाही, प्रशासनिक चूक और नियमों के उल्लंघन के आरोप लगाए गए हैं। इतना ही नहीं, 26 जनवरी को सम्मानित किए गए डॉक्टरों में से एक के खिलाफ तो विभाग में पहले से ही वित्तीय अनियमितता का मामला लंबित चल रहा है। इसके बावजूद उन्हें सम्मानित किया जाना विभाग की जांच और चयन प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाता है।

मामले की गंभीरता यहीं खत्म नहीं होती। विभाग ने इस सूची में एक प्राइवेट सेक्टर से जुड़े व्यक्ति को भी सम्मानित कर दिया, जबकि मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट का सम्मान मुख्य रूप से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को दिया जाना चाहिए था। इस निर्णय को लेकर भी विभाग के भीतर और बाहर आलोचना हो रही है।

बताया जा रहा है कि जिन कारणों से डॉक्टरों को नोटिस जारी किए गए हैं, उनमें सबसे बड़ा मामला बीमा क्लेम से जुड़ा हुआ है। विभाग ने स्वयं स्वीकार किया है कि हॉस्पिटल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के चलते कई महत्वपूर्ण बीमा क्लेम समय पर और सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किए गए। इसके चलते बीमा कंपनियों ने ये क्लेम रिजेक्ट कर दिए, जिससे न केवल हॉस्पिटल बल्कि राज्य सरकार को भी करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ।

सूत्रों का कहना है कि इन क्लेम्स के रिजेक्ट होने से सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है और मरीजों की सुविधाओं पर भी इसका असर पड़ा है। इसके बावजूद जिन अधिकारियों की लापरवाही सामने आई, उन्हें पहले सम्मानित किया गया और बाद में नोटिस थमा दिए गए, जिससे विभाग की साख पर सवाल उठ रहे हैं।

इस पूरे मामले को लेकर विभागीय स्तर पर असहज स्थिति बनी हुई है। जानकारों का कहना है कि यदि किसी अधिकारी के खिलाफ जांच या वित्तीय अनियमितता का मामला लंबित है, तो उसे सम्मानित करने से पहले पूरी पड़ताल होनी चाहिए थी। ऐसा न होना यह दर्शाता है कि विभाग में आंतरिक समन्वय और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया कमजोर है।

फिलहाल मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि, विभाग ने इतना जरूर माना है कि बीमा क्लेम से जुड़े मामलों में हॉस्पिटल प्रशासन की लापरवाही रही है। अब यह देखना होगा कि कारण बताओ नोटिस का जवाब मिलने के बाद विभाग क्या कार्रवाई करता है और इस ‘सम्मान बनाम नोटिस’ के विरोधाभास पर किस तरह सफाई देता है।