Aapka Rajasthan

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, प्रदेश के 93 बजरी खनन पट्टों की लीज समाप्त, वीडियो में जाने ई-नीलामी आदेश रद्द

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, प्रदेश के 93 बजरी खनन पट्टों की लीज समाप्त, वीडियो में जाने ई-नीलामी आदेश रद्द
 
हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, प्रदेश के 93 बजरी खनन पट्टों की लीज समाप्त, वीडियो में जाने ई-नीलामी आदेश रद्द

प्रदेश में बजरी खनन को लेकर हाईकोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा दी गई 93 बजरी खनन पट्टों की लीज को समाप्त कर दिया है। यह आदेश कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एस.पी. शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने डॉ. बृजमोहन सपूत कला संस्कृति सेवा संस्थान की ओर से दायर जनहित याचिका को स्वीकार करते हुए पारित किए हैं। अदालत के इस फैसले से प्रदेश में बजरी खनन की मौजूदा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि खनन से जुड़े नियमों के अनुसार, किसी भी खनन क्षेत्र में निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद अगले पांच वर्षों तक वहां दोबारा खनन नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद राज्य सरकार ने नियमों को दरकिनार करते हुए पुराने खनन क्षेत्रों को छोटे-छोटे ब्लॉकों में विभाजित कर फिर से नीलामी कर दी। अदालत ने इसे नियमों के खिलाफ और अवैध करार दिया।

अदालत के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि राज्य सरकार ने 12 से 100 हैक्टेयर तक के छोटे ब्लॉक बनाकर उन्हीं क्षेत्रों को दोबारा ई-नीलामी के जरिए आवंटित कर दिया, जहां पहले से खनन हो चुका था। कोर्ट ने माना कि यह प्रक्रिया खनन नियमों और पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांतों का उल्लंघन है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने प्रदेश के सभी 93 बजरी खनन पट्टों के ई-नीलामी आदेश को रद्द कर दिया।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने कहा कि सरकार यह स्पष्ट करे कि जिन स्थानों से बजरी निकाली जाएगी, वहां बजरी का पुनर्भरण यानी रीप्लेनिशमेंट कैसे किया जाएगा। अदालत ने राज्य सरकार को इस संबंध में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने के आदेश दिए हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि खनन केवल राजस्व का साधन नहीं हो सकता, बल्कि इससे पर्यावरण, नदी तंत्र और भूजल स्तर पर पड़ने वाले प्रभावों को भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए। अदालत ने निर्देश दिए कि राज्य सरकार यह रिपोर्ट तैयार कर हाईकोर्ट में पेश करे। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि चाहे तो राज्य सरकार इस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में बजरी खनन से जुड़े लंबित मामलों में भी प्रस्तुत कर सकती है।

इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण और खनन नियमों के पालन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। याचिकाकर्ता संस्था की ओर से कोर्ट में दलील दी गई थी कि अवैध और अनियंत्रित बजरी खनन से नदियों का अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है, जिससे पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है। कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।

हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद प्रदेश में बजरी खनन से जुड़े कारोबारियों में हलचल मच गई है। वहीं, प्रशासन के सामने अब नई चुनौती खड़ी हो गई है कि वह नियमों के अनुरूप नई नीति तैयार करे और पर्यावरण संरक्षण के साथ खनन गतिविधियों को संतुलित करे। आने वाले दिनों में इस फैसले का बजरी आपूर्ति, निर्माण कार्यों और सरकारी राजस्व पर भी असर पड़ना तय माना जा रहा है।