Aapka Rajasthan

प्री-मैच्योर बच्चों में अंधेपन का खतरा बढ़ा, RNT अस्पताल में 6 महीने में 1583 केस; 59% नवजातों का वजन 2.5 किलो से कम

प्री-मैच्योर बच्चों में अंधेपन का खतरा बढ़ा, RNT अस्पताल में 6 महीने में 1583 केस; 59% नवजातों का वजन 2.5 किलो से कम
 
प्री-मैच्योर बच्चों में अंधेपन का खतरा बढ़ा, RNT अस्पताल में 6 महीने में 1583 केस; 59% नवजातों का वजन 2.5 किलो से कम

समय से पहले जन्म लेने वाले नवजात बच्चों की सेहत को लेकर चिंता बढ़ाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। आरएनटी अस्पताल में पिछले छह महीनों के दौरान प्री-मैच्योर और कम वजन वाले नवजातों से जुड़े 1583 मामले सामने आए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अस्पताल में भर्ती 59 प्रतिशत नवजातों का वजन 2.5 किलोग्राम से कम था। ऐसे बच्चों में कई स्वास्थ्य समस्याओं के साथ आंखों की रोशनी प्रभावित होने का खतरा भी रहता है।

समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में आंखों की रक्त वाहिकाओं का विकास पूरी तरह नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में कुछ नवजातों को रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (ROP) नाम की बीमारी होने का खतरा रहता है। समय पर जांच और इलाज नहीं मिलने पर गंभीर मामलों में यह बीमारी स्थायी दृष्टि हानि या अंधेपन का कारण बन सकती है।

समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों को ज्यादा खतरा

गर्भावस्था के 37 सप्ताह पूरे होने से पहले जन्म लेने वाले शिशुओं को प्री-मैच्योर कहा जाता है। ऐसे बच्चों के शरीर के कई अंग पूरी तरह विकसित नहीं हुए होते। जन्म के समय वजन कम होने पर उनकी देखभाल और नियमित चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत बढ़ जाती है।

विशेष रूप से बहुत कम गर्भावधि में जन्म लेने वाले और कम वजन वाले बच्चों की आंखों की जांच महत्वपूर्ण होती है। हालांकि, कम वजन वाले हर बच्चे को आंखों की बीमारी हो, यह जरूरी नहीं है। जोखिम का आकलन बच्चे की गर्भावधि, जन्म के समय वजन और अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।

ROP बीमारी में क्यों जरूरी है समय पर जांच?

रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी यानी ROP नवजात बच्चों की आंखों के पर्दे (रेटिना) में रक्त वाहिकाओं के असामान्य विकास से जुड़ी बीमारी है। शुरुआती चरणों में इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं दे सकते। इसलिए केवल बच्चे की आंखों को देखकर बीमारी का पता लगाना संभव नहीं होता।

डॉक्टरों की सलाह के अनुसार, जोखिम वाले प्री-मैच्योर नवजातों की निर्धारित समय पर आंखों की जांच कराना जरूरी है। यदि बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच जाए, तो आंखों की रोशनी को नुकसान हो सकता है। समय पर पहचान होने पर कई मामलों में उपचार से दृष्टि बचाने में मदद मिलती है।

माता-पिता किन बातों का रखें ध्यान?

समय से पहले जन्म लेने वाले या कम वजन वाले नवजातों के माता-पिता को अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार फॉलोअप जारी रखना चाहिए। आंखों की जांच की तारीख नहीं टालनी चाहिए, क्योंकि शुरुआत में बीमारी के लक्षण नजर नहीं आ सकते।

बच्चे का वजन कम होने या जन्म समय से पहले होने पर घबराने के बजाय नवजात विशेषज्ञ से जोखिम और जांच की सही समयसीमा के बारे में जानकारी लेनी चाहिए।

1583 मामलों के आंकड़े ने बढ़ाई चिंता

आरएनटी अस्पताल में छह महीने के दौरान सामने आए 1583 मामलों और 59 प्रतिशत नवजातों के कम वजन की जानकारी ने नवजात देखभाल की जरूरत को रेखांकित किया है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़ों से यह स्पष्ट नहीं है कि 1583 मामले केवल ROP की जांच से जुड़े हैं या प्री-मैच्योर और कम वजन वाले नवजातों के सभी मामलों से। इसलिए इसे अंधेपन के पुष्ट मामलों की संख्या नहीं माना जा सकता।

समय पर स्क्रीनिंग, विशेषज्ञों की निगरानी और जरूरत पड़ने पर उपचार से प्री-मैच्योर बच्चों की आंखों की रोशनी सुरक्षित रखने की संभावना बढ़ सकती है।