सीमित संसाधनों से शुरू हुई ‘राजस्थान पत्रिका’, जनसरोकार पत्रकारिता की बनी मिसाल
7 मार्च 1956 को जयपुर से श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश ने राजस्थान पत्रिका का प्रकाशन एक पन्ने के सांध्यकालीन दैनिक के रूप में शुरू किया। उस समय संसाधन सीमित थे, लेकिन उद्देश्य स्पष्ट और दृष्टि दूरदर्शी थी—जनसरोकार आधारित पत्रकारिता को मजबूती देना।
शुरुआती वर्षों में पत्रिका को अपने सफर में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। संसाधनों की कमी के कारण अखबार निजी प्रेसों में छपता था। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद भी कर्पूर चन्द्र कुलिश जी ने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया और पत्रकारिता को एक मजबूत नैतिक आधार प्रदान किया।
कुलिश जी का मानना था कि पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य समाज को सही और सटीक जानकारी देना है, न कि सनसनी फैलाना। इसी सोच के साथ उन्होंने पत्रिका को ऐसी दिशा दी, जहां तथ्यपरक और संतुलित रिपोर्टिंग को प्राथमिकता दी गई। उन्होंने हमेशा जनहित को सर्वोपरि रखा और समाज के हर वर्ग की आवाज बनने का प्रयास किया।
उनके नेतृत्व में पत्रिका ने धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई और पाठकों का विश्वास जीतने में सफल रही। निष्पक्ष और विश्वसनीय समाचारों के कारण अखबार ने अपनी अलग पहचान स्थापित की और समय के साथ यह एक बड़े समाचार समूह के रूप में विकसित हुआ।
कुलिश जी की यह सोच कि पत्रकारिता समाज का दर्पण है, आज भी राजस्थान पत्रिका के मूल सिद्धांतों में शामिल है। उन्होंने पत्रकारिता को केवल खबरों तक सीमित न रखते हुए उसे समाज सुधार और जनजागरूकता का माध्यम बनाया।
कुल मिलाकर, सीमित संसाधनों से शुरू हुई राजस्थान पत्रिका की यह यात्रा कर्पूर चन्द्र कुलिश के दृढ़ संकल्प, सिद्धांतों और जनसरोकार आधारित पत्रकारिता का जीवंत उदाहरण है, जो आज भी पत्रकारिता जगत के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
