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राजस्थान हाईकोर्ट ने मुस्लिम तलाक मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द किया, वीडियो में जानें कहा - आपसी सहमति में अड़चनें नहीं डालें फैमिली कोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने मुस्लिम तलाक मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द किया, वीडियो में जानें कहा - आपसी सहमति में अड़चनें नहीं डालें फैमिली कोर्ट
 
राजस्थान हाईकोर्ट ने मुस्लिम तलाक मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द किया, वीडियो में जानें कहा - आपसी सहमति में अड़चनें नहीं डालें फैमिली कोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आपसी सहमति से होने वाले तलाक यानी मुबारत को लेकर अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के रवैये पर तल्खी जाहिर करते हुए कहा कि जब पति-पत्नी दोनों अलग होने के लिए रजामंद हैं, तो अदालत को उसमें तकनीकी अड़चनें नहीं डालनी चाहिए।

जोधपुर मुख्यपीठ में जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने मेड़ता फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। मेड़ता फैमिली कोर्ट ने पहले एक मुस्लिम दंपती के आपसी सहमति से तलाक को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यदि दोनों पक्ष अलग होने के लिए सहमत हैं, तो अदालत को उनकी इच्छा का सम्मान करना चाहिए।

हाईकोर्ट ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट की शुरुआत ही पुरानी कहावत को उल्टे रूप में पेश करते हुए की: “यह मामला ऐसा है जहां ‘मियां-बीवी राजी, नहीं मान रहा काजी’ वाली स्थिति बन गई है।” इसका तात्पर्य यह है कि अदालत ने स्पष्ट किया कि दंपती की सहमति को तकनीकी या औपचारिक अड़चनों के कारण रोका नहीं जाना चाहिए।

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया को सम्मान देने का अर्थ है कि पति और पत्नी की इच्छा को प्राथमिकता दी जाए। जजों ने यह रुख अपनाया कि यदि दोनों पक्ष अलग होने के इच्छुक हैं, तो फैमिली कोर्ट को उन्हें कानूनी रूप से अलग होने का रास्ता सुगम बनाना चाहिए।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ और आपसी सहमति से तलाक के मामलों में एक अहम मिसाल बन सकता है। इसके जरिए यह स्पष्ट संदेश गया है कि अगर पति-पत्नी दोनों अलग होने के लिए राजी हैं, तो अदालत को उनकी सहमति को प्राथमिकता देनी चाहिए और इसे बाधित नहीं करना चाहिए।

इस मामले में दंपती की सहमति को मान्यता न देने वाले फैमिली कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट ने पूरी तरह रद्द कर दिया। फैसले के बाद न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि अब ऐसे मामलों में तकनीकी तिकड़म या औपचारिकताओं के कारण तलाक की मंजूरी रोकने का रुख बदल सकता है।

राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक से जुड़े मामलों में नया दृष्टिकोण स्थापित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे तलाक की प्रक्रिया सरल और दोनों पक्षों के लिए पारदर्शी होगी। अदालत ने यह भी माना कि आपसी सहमति से तलाक को रोकने से दंपती मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रभावित हो सकते हैं।

इस फैसले के बाद अदालत ने यह संदेश दिया कि कानून केवल औपचारिकताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य पक्षों की इच्छाओं और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करना भी है। इस तरह, राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय मुस्लिम तलाक मामलों में न्याय और सहमति के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।