राजस्थान हाईकोर्ट ने 22 साल पुराने बीएसएफ बर्खास्तगी आदेश को बदला, फुटेज में देंखे जवान को मिली राहत
राजस्थान हाईकोर्ट ने बीएसएफ के एक जवान को बड़ी न्यायिक राहत दी है। अदालत ने उसके 22 साल पुराने बर्खास्तगी आदेश को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया। इस फैसले के बाद जवान को पेंशन और अन्य लाभ पाने का मार्ग खुल गया है, हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि बीते 22 साल का वेतन और भत्ते उसे नहीं दिए जाएंगे।
यह निर्णय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एसपी शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने सुनाया। मामले में जवान पवन प्रजापति और केंद्र सरकार द्वारा दायर अपील पर सुनवाई हुई। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि जवान के अपराध और बर्खास्तगी की सजा के बीच अनुपात में असंगति है।
हाईकोर्ट ने कहा कि बीएसएफ जवान के अपराध के लिए बर्खास्तगी जैसी कठोर सजा न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने निर्देश दिया कि जवान की सेवा को पेंशन के लिए आवश्यक न्यूनतम सेवा अवधि तक काल्पनिक रूप से नियमित माना जाएगा। हालांकि, इस अवधि का वेतन या भत्ते उसे प्राप्त नहीं होंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला बीएसएफ और अन्य सुरक्षा बलों में न्यायसंगत सजा और सेवा नियमों के अनुपालन को स्पष्ट करता है। अदालत ने यह निर्णय यह सुनिश्चित करने के लिए दिया कि जवान के अधिकारों के साथ-साथ सेना में अनुशासन भी बना रहे।
बीएसएफ के अधिकारियों ने बताया कि पवन प्रजापति को अब अनिवार्य सेवानिवृत्ति के अनुसार पेंशन और संबंधित लाभ मिलेंगे। हालांकि, पिछले 22 साल का वेतन और भत्ते शामिल नहीं होंगे। अधिकारियों के अनुसार, यह कदम जवान के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ सेवा नियमों में न्यायसंगत ढ़ांचा स्थापित करता है।
विशेषज्ञों ने कहा कि इस तरह के मामले लंबे समय तक अदालतों में विचाराधीन रहते हैं और जवानों को सेवा के दौरान अनुचित बर्खास्तगी या अनुशासनात्मक कार्रवाई के खिलाफ न्यायिक राहत मिलना उनकी सेवा सुरक्षा और मानसिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है।
सामाजिक और कानूनी विश्लेषकों का कहना है कि राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला सैनिकों और जवानों के अधिकारों के प्रति न्यायालय की संवेदनशीलता को दर्शाता है। साथ ही, यह उदाहरण पेश करता है कि न्यायपालिका सजा के कठोरपन और अपराध के अनुपात को ध्यान में रखते हुए निर्णय ले सकती है।
संक्षेप में, राजस्थान हाईकोर्ट ने बीएसएफ जवान पवन प्रजापति को राहत देते हुए 22 साल पुराने बर्खास्तगी आदेश को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि सेवा अवधि को पेंशन के लिए नियमित माना जाएगा, लेकिन पिछले वेतन और भत्ते नहीं दिए जाएंगे। यह फैसला न केवल जवान के अधिकारों की सुरक्षा करता है बल्कि सेना में अनुशासन और न्यायसंगत कार्रवाई के सिद्धांत को भी मजबूत करता है।
