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राजस्थान हाईकोर्ट का अहम आदेश, फुटेज में देखें आपराधिक मामलों में नार्को, पॉलीग्राफ और वैज्ञानिक टेस्ट के लिए दी गई सहमति वापस ली जा सकती है

राजस्थान हाईकोर्ट का अहम आदेश, फुटेज में देखें आपराधिक मामलों में नार्को, पॉलीग्राफ और वैज्ञानिक टेस्ट के लिए दी गई सहमति वापस ली जा सकती है
 
राजस्थान हाईकोर्ट का अहम आदेश, फुटेज में देखें आपराधिक मामलों में नार्को, पॉलीग्राफ और वैज्ञानिक टेस्ट के लिए दी गई सहमति वापस ली जा सकती है

राजस्थान हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों में सहमति आधारित वैज्ञानिक परीक्षणों को लेकर एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी आरोपी नार्को, पॉलीग्राफ या किसी अन्य वैज्ञानिक टेस्ट के लिए अपनी एक बार दी गई सहमति को कभी भी वापस ले सकता है। इसका मतलब यह है कि आरोपी की सहमति को कभी भी अटल नहीं माना जा सकता और उसे जबरदस्ती इस तरह के परीक्षणों के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

यह आदेश जस्टिस अनूप ढंढ की अदालत ने सुभाष सैनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर आरोपी को अपनी सहमति वापस लेने की अनुमति नहीं दी जाती है, तो यह उसकी स्वतंत्र इच्छा और सहमति के खिलाफ होगा। ऐसे मामले में आरोपी पर वैज्ञानिक परीक्षण थोपना मौलिक अधिकारों और चुप रहने के अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि चुप रहने का अधिकार भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल आधार है। किसी भी आरोपी को उसके खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। जांच एजेंसियों के पास यह अधिकार नहीं है कि वे आरोपी पर वैज्ञानिक परीक्षण थोपें। आरोपी की स्वतंत्र इच्छा सर्वोपरि है और उसका सम्मान करना अनिवार्य है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे परीक्षणों के लिए सहमति देने के बाद भी आरोपी अपने निर्णय को बदल सकता है, यानी परीक्षण शुरू होने से पहले भी वह अपनी सहमति वापस ले सकता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी भी आरोपी को मानसिक दबाव या डर में परीक्षण के लिए सहमति देने पर मजबूर नहीं किया जा सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश अपराध जांच प्रक्रिया में न्याय और स्वतंत्रता को मजबूत करने वाला कदम है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि आरोपी के मौलिक अधिकार, निजता और चुप रहने का अधिकार सुरक्षित रहे। कोर्ट का यह आदेश जांच एजेंसियों के लिए स्पष्ट संदेश है कि वे केवल सहमति से ही परीक्षण कर सकते हैं और आरोपी की इच्छा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकते।

इस आदेश से यह भी संकेत मिलता है कि भारत की न्यायिक प्रणाली स्वतंत्रता, सहमति और मानवाधिकारों के महत्व को सर्वोपरि मानती है। कोर्ट ने कहा कि वैज्ञानिक परीक्षण का उद्देश्य केवल सच्चाई का पता लगाना होना चाहिए, न कि आरोपी को डराने या उसके अधिकारों का हनन करने का।

राजस्थान हाईकोर्ट का यह आदेश भविष्य में अपराध जांच और वैज्ञानिक परीक्षणों के संचालन के लिए मार्गदर्शक साबित होगा। इससे आरोपी और उसकी स्वतंत्रता के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित होगी और जांच एजेंसियों को भी न्यायिक प्रक्रिया में अनुशासन और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए प्रेरित किया जाएगा।