सोशल मीडिया पर वायरल भ्रामक पोस्ट पर राजस्थान हाईकोर्ट ने मेटा को ब्लॉक/डिलीट का आदेश दिया
राजस्थान की राजधानी जयपुर में सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक भ्रामक पोस्ट को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने सात साल की नाबालिग बच्ची की याचिका पर सुनवाई करते हुए सोशल मीडिया कंपनी मेटा को आदेश दिया है कि विवादित पोस्ट और उससे जुड़ी सभी भ्रामक कड़ियों को तुरंत ब्लॉक या डिलीट किया जाए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की गलत और भ्रामक जानकारी से न केवल याचिकाकर्ता बच्ची बल्कि उसकी मां की सुरक्षा और मानसिक शांति पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। अदालत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी और निगरानी को लेकर भी सख्त टिप्पणी की और कहा कि ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।
याचिका में बताया गया कि बच्ची और उसकी मां को सोशल मीडिया पर उत्पीड़न और धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। वायरल पोस्ट और उससे जुड़े लिंक ने उनके सामाजिक और निजी जीवन को प्रभावित किया है। उच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर फैलने वाली गलत सूचनाएं लोगों के जीवन और सुरक्षा के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती हैं।
अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों को केवल तकनीकी प्लेटफॉर्म नहीं माना जा सकता, बल्कि उन्हें सामाजिक जिम्मेदारी के तहत ऐसे कंटेंट की निगरानी करनी होगी। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि भ्रामक पोस्ट, फोटो और वीडियो को तुरंत हटाया जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए प्रभावी प्रणाली बनाई जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली झूठी सूचनाएं न केवल व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती हैं, बल्कि सामाजिक अशांति और मानसिक तनाव भी पैदा कर सकती हैं। इस फैसले से यह संदेश भी गया है कि नाबालिगों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए न्यायालय सतर्क है और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी तय कर रहा है।
राजस्थान हाईकोर्ट का यह आदेश देशभर में सोशल मीडिया कंपनियों के लिए एक निर्देशात्मक कदम माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को तेज़ और जिम्मेदार कार्रवाई करनी होगी, ताकि कोई भी व्यक्ति भ्रामक या अपमानजनक सामग्री से पीड़ित न हो।
सोशल मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के आदेश डिजिटल जगत में जागरूकता और सावधानी बढ़ाने में मदद करेंगे। प्लेटफॉर्म्स के लिए यह संकेत है कि वे केवल तकनीकी इंटरफेस नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और कानूनी दायित्वों के अंतर्गत कार्य करने के लिए बाध्य हैं।
इस फैसले के बाद नाबालिग बच्ची और उसकी मां को न्यायालय से सुरक्षा और राहत मिली है। हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया के बढ़ते दुरुपयोग के मद्देनजर कहा कि ऐसे मामलों में सख्त और त्वरित कार्रवाई आवश्यक है, ताकि डिजिटल प्लेटफॉर्म सुरक्षित और जिम्मेदार बन सके।
इस तरह राजस्थान हाईकोर्ट ने यह साबित कर दिया कि डिजिटल युग में न्यायपालिका भी सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल पर नजर रख रही है और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्णायक कदम उठा सकती है।
