राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्यपाल और राजस्थान यूनिवर्सिटी के चांसलर को नोटिस जारी किया, एक्सक्लूसिव फुटेज में देंखे वीसी की नियुक्ति पर उठे सवाल
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्यपाल और राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ वेटेनरी एंड एनिमल साइंसेज के चांसलर हरिभाऊ बागड़े को नोटिस जारी किया है। जस्टिस आनंद शर्मा की अदालत ने यह नोटिस डॉ. आर के बाघेरवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया। याचिका में राज्यपाल द्वारा नियुक्त किए गए यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर (वीसी) संमत व्यास की नियुक्ति को चुनौती दी गई है।
वीसी की नियुक्ति को लेकर याचिका में क्या कहा गया?
याचिका में डॉ. आर के बाघेरवाल ने दावा किया कि राज्यपाल द्वारा संमत व्यास को 4 सितंबर 2025 तक के लिए वाइस चांसलर नियुक्त करना पूरी तरह से नियमों के खिलाफ है और इसे रद्द किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि संमत व्यास के पास आवश्यक 10 साल का टीचिंग अनुभव नहीं है, जो वीसी के पद पर नियुक्ति के लिए अनिवार्य शर्त है। ऐसे में, उनकी नियुक्ति पूरी तरह से अवैध है।
राज्यपाल और वीसी से तीन सप्ताह में जवाब की मांग
राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में राज्यपाल हरिभाऊ बागडे, राजस्थान यूनिवर्सिटी के वीसी संमत व्यास, रजिस्ट्रार और राज्य सरकार से तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। अदालत ने यह आदेश उस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया जिसमें राज्यपाल की ओर से की गई वीसी की नियुक्ति को चुनौती दी गई थी।
वीसी की नियुक्ति का विवाद
संमत व्यास की नियुक्ति को लेकर यह विवाद तब सामने आया जब यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने निर्धारित नियमों और मानदंडों का उल्लंघन किया है। टीचिंग अनुभव की कमी, जो एक महत्वपूर्ण योग्यतापरक शर्त थी, उनकी नियुक्ति पर सवाल खड़ा करती है। वहीं, यह मामला राजस्थान यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक संचालन पर भी प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि वीसी के पद पर नियुक्ति से जुड़े नियमों का पालन न करने से विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और अधिकारिता पर भी सवाल उठ सकते हैं।
अदालत की प्रतिक्रिया और आगे की कार्रवाई
राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा नोटिस जारी करने के बाद अब यह देखना होगा कि राज्यपाल और अन्य संबंधित पक्ष मामले में अपनी स्थिति कैसे स्पष्ट करते हैं। अदालत ने तीन सप्ताह का समय दिया है, जिसमें जवाब दाखिल करने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। इस मामले की सुनवाई से राजस्थान यूनिवर्सिटी की प्रशासनिक प्रक्रिया और नियमों के पालन पर भी नज़र रहेगी।
यह मामला राज्य में शिक्षा प्रशासन और उच्च शिक्षा के संचालन को लेकर अहम हो सकता है, और इसके परिणामस्वरूप विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों की पारदर्शिता और नियामक प्रक्रियाओं पर एक नई बहस भी उत्पन्न हो सकती है।
