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राजस्थान हाईकोर्ट सख्त: एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट पर 4 सप्ताह में निर्णय लें, वरना मुख्य सचिव को होना पड़ेगा पेश; मई 2025 से अटका है बिल

राजस्थान हाईकोर्ट सख्त: एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट पर 4 सप्ताह में निर्णय लें, वरना मुख्य सचिव को होना पड़ेगा पेश; मई 2025 से अटका है बिल
 
राजस्थान हाईकोर्ट सख्त: एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट पर 4 सप्ताह में निर्णय लें, वरना मुख्य सचिव को होना पड़ेगा पेश; मई 2025 से अटका है बिल

राजस्थान में वकीलों की सुरक्षा से जुड़े एडवोकेट्स प्रोटेक्शन बिल को लेकर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर अंतिम निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय में फैसला नहीं लिया गया, तो राज्य के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होकर देरी का स्पष्टीकरण देना होगा। यह मामला मई 2025 से लंबित है और अब अदालत ने इस पर जल्द कार्रवाई करने की जरूरत जताई है।

जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान निर्देश

राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को इस मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति महेंद्र कुमार गोयल और न्यायमूर्ति भुवन गोयल शामिल थे। पूर्व जयपुर बार एसोसिएशन अध्यक्ष प्रहलाद शर्मा की ओर से दायर जनहित याचिका में बिल पर निर्णय नहीं होने और वकीलों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता का मुद्दा उठाया गया है।

याचिका में कहा गया है कि अधिवक्ताओं पर हमले और अन्य आपराधिक घटनाओं की आशंका के बीच उनकी सुरक्षा के लिए कानून जरूरी है। इसके साथ ही वकीलों के कल्याण कोष में योगदान और युवा अधिवक्ताओं को स्टाइपेंड देने जैसे मुद्दे भी याचिका में उठाए गए हैं।

मई 2025 से क्यों अटका है बिल?

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त महाधिवक्ता विज्ञान शाह ने अदालत को बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 मई 2025 को राज्य सरकार को पत्र लिखकर बिल पर दोबारा विचार करने या उसे वापस लेने को कहा था। केंद्र की ओर से अलग-अलग पेशों के लिए अलग कानून बनाने की उपयुक्तता पर सवाल उठाए गए थे।

इसके बाद बिल से संबंधित टिप्पणियों और स्पष्टीकरण को लेकर प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। इसी देरी को लेकर अदालत में सवाल उठाए गए हैं। अब हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को चार सप्ताह का समय दिया है, ताकि मामले पर अंतिम निर्णय लिया जा सके।

बिल में वकीलों की सुरक्षा के क्या प्रावधान हैं?

राजस्थान एडवोकेट्स प्रोटेक्शन बिल, 2023 को 15 मार्च 2023 को विधानसभा में पेश किया गया था। इसके प्रस्तावित प्रावधानों में वकीलों पर हमला, गंभीर चोट पहुंचाना, आपराधिक बल का इस्तेमाल और पेशेवर काम से संबंधित आपराधिक धमकी जैसे कृत्यों पर कार्रवाई का प्रावधान शामिल है। बिल में दोषी पाए जाने वालों के लिए सजा और जुर्माने का भी उल्लेख है। हालांकि, ये प्रस्तावित प्रावधान हैं और इन्हें लागू कानून के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

चार सप्ताह में फैसले पर रहेगी नजर

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब राज्य सरकार को निर्धारित समयसीमा में इस मामले पर निर्णय लेना होगा। यदि ऐसा नहीं होता है, तो मुख्य सचिव को अदालत में उपस्थित होकर देरी के कारण बताने पड़ सकते हैं।

यह मामला केवल विधायी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि वकीलों की सुरक्षा और उनके कल्याण से भी जुड़ा है। अब देखना होगा कि राज्य सरकार चार सप्ताह के भीतर क्या कदम उठाती है और लंबे समय से लंबित बिल पर आगे की प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है।