राजस्थान हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने दिए नगरीय निकाय चुनाव अप्रैल तक कराने के निर्देश, सरकार का रोडमैप तय नहीं
राजस्थान में शहरी राजनीति बड़े बदलाव के दौर में आ गई है। राज्य की चुनी हुई शहरी सरकारें (शहरी निकाय बोर्ड) खत्म होने वाली हैं, और उनका पूरा कंट्रोल ब्यूरोक्रेसी के हाथों में जाने वाला है। 3,035 वार्ड वाली 90 शहरी निकायों का कार्यकाल जनवरी में खत्म हो रहा है। इसके बाद सिर्फ एक निकाय (झुंझुनू की विद्या विहार नगर पालिका) बचेगा, जिसका कार्यकाल भी फरवरी में खत्म हो जाएगा।
इससे राज्य के इतिहास में पहली बार ऐसी स्थिति बनेगी जब सभी 196 शहरी निकायों (नई बनी निकायों को छोड़कर) में कोई चुना हुआ बोर्ड नहीं होगा। इसका मतलब है कि पूरा शहरी सिस्टम जनप्रतिनिधियों के बजाय एडमिनिस्ट्रेटिव अधिकारियों के कंट्रोल में होगा। फिलहाल, 105 शहरी निकायों में एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त किए गए हैं, जबकि 113 नई बनी निकायों में पहले से ही एडमिनिस्ट्रेटर काम कर रहे हैं। पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान 196 शहरी निकायों के चुनाव हुए थे।
चुनावों को लेकर असमंजस, गरमागरम राजनीति
राजनीतिक नजरिए से यह स्थिति बेहद अहम मानी जा रही है। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अप्रैल तक नगर निगम चुनाव कराने का निर्देश दिया है, लेकिन सरकार ने अभी तक चुनाव की तारीखों के लिए कोई साफ रोडमैप नहीं बनाया है। इस कन्फ्यूजन ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है।
लोकल पॉलिटिक्स पर असर
काउंसलर और चेयरमैन का रोल खत्म होने से जनता और सरकार के बीच सीधा पॉलिटिकल रिश्ता कमजोर हो रहा है।
विकास के काम और पॉलिसी से जुड़े फैसले अब चुने हुए नुमाइंदों के बजाय अधिकारी ले रहे हैं।
जनता की सबसे बड़ी चिंता यह है कि उनकी रोज़मर्रा की दिक्कतों को कौन सुलझाएगा, क्योंकि पहले उनकी सीधी पहुंच वार्ड पार्षद तक थी।
लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों की पावर अधिकारियों को क्यों दी जा रही है?
पॉलिसी से जुड़े फैसले और बड़े टेंडर चुनाव और बोर्ड बनने तक क्यों नहीं रोके जाने चाहिए?
अगर नगर निकायों में ऐसी स्थिति बनती है, तो ऑपरेशन के लिए साफ गाइडलाइन क्यों नहीं बनाई जानी चाहिए?
नगर निकायों के बैंक अकाउंट से पैसे निकालना ट्रांसपेरेंट होना चाहिए, यानी सुरक्षित होना चाहिए।
नगर निगम कानून तोड़ने वालों पर कोई एक्शन क्यों नहीं लिया जाता, जबकि उसमें तुरंत चुनाव कराने का प्रावधान है?
