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राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में मरीजों की सेहत से खिलवाड़? पानी में मिले सीवेज बैक्टीरिया, नाइट्रेट तय सीमा से 6 गुना ज्यादा

राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में मरीजों की सेहत से खिलवाड़? पानी में मिले सीवेज बैक्टीरिया, नाइट्रेट तय सीमा से 6 गुना ज्यादा
 
राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में मरीजों की सेहत से खिलवाड़? पानी में मिले सीवेज बैक्टीरिया, नाइट्रेट तय सीमा से 6 गुना ज्यादा

राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंच रहे मरीजों के सामने संक्रमण का खतरा पैदा होने का मामला सामने आया है। जयपुर, सीकर और श्रीगंगानगर के एक दर्जन से ज्यादा अस्पतालों के पानी की जांच में गंभीर खामियां मिली हैं। कहीं पानी में सीवेज से जुड़े बैक्टीरिया पाए गए, तो कहीं नाइट्रेट की मात्रा निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक मिली। इन रिपोर्टों ने अस्पतालों में पेयजल की गुणवत्ता, पानी की टंकियों की सफाई और फिल्टर सिस्टम की निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अस्पतालों में मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कई बार कमजोर होती है। ऐसे में दूषित पानी उनके लिए अतिरिक्त स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। अस्पताल परिसर में इस्तेमाल होने वाले पानी की नियमित जांच और सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता इसलिए बेहद जरूरी है।

रावला मंडी सीएचसी के पानी में मिले 460 बैक्टीरिया

श्रीगंगानगर जिले के रावला मंडी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) के पानी की जांच में 100 मिलीलीटर नमूने में 460 बैक्टीरिया मिलने की जानकारी सामने आई है। पानी में बैक्टीरिया की मौजूदगी उसकी गुणवत्ता और संभावित संदूषण को लेकर चिंता बढ़ाती है।

यदि पानी में मल या सीवेज से जुड़े सूक्ष्मजीव मौजूद हों, तो दूषित पानी के सेवन से पेट और आंतों से संबंधित संक्रमण का खतरा हो सकता है। हालांकि, बैक्टीरिया की संख्या के साथ उनकी पहचान और जांच की पूरी रिपोर्ट के आधार पर ही संक्रमण के वास्तविक जोखिम का आकलन किया जा सकता है।

सीकर के जनाना अस्पताल में नाइट्रेट 290 मिलीग्राम प्रति लीटर

सीकर के जनाना अस्पताल के पानी में नाइट्रेट की मात्रा भी निर्धारित सीमा से काफी अधिक मिली। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पानी में नाइट्रेट 290 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज किया गया, जबकि बताई गई निर्धारित सीमा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर है। यानी जांच में नाइट्रेट का स्तर तय सीमा से छह गुना से भी ज्यादा रहा।

पानी में नाइट्रेट की अधिक मात्रा स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय हो सकती है। इसका जोखिम खास तौर पर शिशुओं और संवेदनशील लोगों के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में अस्पतालों में पानी की गुणवत्ता की समय-समय पर जांच करना और मानकों से बाहर पाए गए पानी के इस्तेमाल को रोकना आवश्यक है।

पानी की जांच और टंकियों की सफाई पर सवाल

जयपुर, सीकर और श्रीगंगानगर के एक दर्जन से ज्यादा अस्पतालों के पानी में खामियां मिलने के बाद निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। अस्पतालों में पानी की टंकियों की सफाई, पाइपलाइन की स्थिति, प्यूरीफायर के रखरखाव और नियमित नमूना जांच की जिम्मेदारी संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था की होती है।

ऐसे मामलों में सिर्फ रिपोर्ट तैयार करना पर्याप्त नहीं है। दूषित पानी मिलने पर उसके स्रोत की पहचान, वैकल्पिक सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था और जरूरी सुधारात्मक कार्रवाई भी महत्वपूर्ण है। साथ ही, दोबारा जांच कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पानी निर्धारित मानकों के अनुरूप है।

मरीजों को सुरक्षित पानी उपलब्ध कराना जरूरी

सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीज और उनके परिजन इलाज के साथ बुनियादी सुविधाओं के लिए भी अस्पताल प्रशासन पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में पेयजल की गुणवत्ता से जुड़ी खामियों को गंभीरता से लेना जरूरी है।

अब अहम सवाल यह है कि जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद संबंधित अस्पतालों में क्या कार्रवाई की गई, पानी की टंकियों की सफाई कब हुई और प्यूरीफायर की निगरानी किस तरह की जा रही है। उपलब्ध जानकारी में सभी प्रभावित अस्पतालों के नाम, जांच की तारीख और रिपोर्ट के बाद की गई कार्रवाई का पूरा विवरण नहीं है। इन तथ्यों के सामने आने से जिम्मेदारी तय करने और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।