डूंगरपुर में खेली गई ‘पत्थर मार होली’, 31 लोग घायल
प्रदेश में होली केवल रंग और गुलाल तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अनोखी परंपराओं के साथ मनाया जाता है। जहां लठमार होली की चर्चा देशभर में होती है, वहीं डूंगरपुर जिले में ‘पत्थर मार होली’ की परंपरा सुर्खियों में है। खासतौर पर सागवाड़ा क्षेत्र अपने विशिष्ट होली उत्सव के लिए जाना जाता है।
डूंगरपुर के भीलूड़ा गांव में धुलंडी के अवसर पर शाम के समय रंग और गुलाल की बजाय पत्थरों से होली खेली गई। पारंपरिक ढोल-कुंडी की थाप और होली के जयघोष के बीच दो गुट आमने-सामने आए और एक-दूसरे पर जमकर पत्थर बरसाए। यह दृश्य जितना रोमांचक था, उतना ही खतरनाक भी।
परंपरा के नाम पर पत्थरबाजी
स्थानीय लोगों के अनुसार यह परंपरा वर्षों पुरानी है और इसे सामुदायिक उत्सव का हिस्सा माना जाता है। दोनों पक्ष पहले से तय स्थान पर इकट्ठा होते हैं और संकेत मिलते ही पत्थरबाजी शुरू हो जाती है। इस दौरान लोग सिर पर पगड़ी या कपड़ा बांधकर खुद को बचाने की कोशिश करते हैं, लेकिन इसके बावजूद हर साल कई लोग घायल हो जाते हैं।
इस बार भी पत्थरों की मार से 31 लोग घायल हो गए। घायलों को तुरंत नजदीकी अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उनका उपचार किया गया। कुछ लोगों को गंभीर चोटें आई हैं, हालांकि किसी की हालत गंभीर बताई नहीं गई है।
सुरक्षा पर उठे सवाल
इस तरह की परंपरा को लेकर हर साल सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। प्रशासन की ओर से एहतियाती इंतजाम किए जाते हैं, लेकिन पत्थरबाजी के दौरान हालात बेकाबू होने का खतरा बना रहता है। स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर मौजूद रहे और स्थिति पर नजर रखी।
परंपरा और जोखिम
विशेषज्ञों का मानना है कि सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान जरूरी है, लेकिन सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पत्थर मार होली जैसी परंपराएं जहां रोमांच और उत्साह का प्रतीक हैं, वहीं इससे गंभीर चोट का जोखिम भी बना रहता है।
डूंगरपुर के भीलूड़ा गांव की यह अनूठी होली एक बार फिर चर्चा में है। रंगों के इस पर्व पर जहां अधिकांश स्थानों पर गुलाल उड़ता है, वहीं यहां पत्थरों की बौछार से होली मनाई जाती है। परंपरा और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना अब प्रशासन और स्थानीय समाज दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
