1971 की जंग में भारतीय सेना की मदद करने वाले पदमसिंह सोढ़ा बने सरपंच, वीडियो में देंखे पाकिस्तान में हवेली पर फहराया था तिरंगा
साल 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारतीय सेना की मदद करने वाले पदमसिंह सोढ़ा अब राजस्थान के बाड़मेर जिले के छाछरो गांव के सरपंच चुने गए हैं। 24 अक्टूबर को हुए सरपंच चुनाव में पदमसिंह ने जीत दर्ज की। उनके चुनाव जीतने के साथ ही 1971 के युद्ध से जुड़ी उनकी कहानी एक बार फिर चर्चा में आ गई है। पदमसिंह ने कभी पाकिस्तान में अपनी पुश्तैनी हवेली पर तिरंगा फहराया था। इसके बाद उन पर पाकिस्तानी सेना की ओर से जासूसी के आरोप लगाए गए थे।करीब 55 साल पहले पदमसिंह सोढ़ा पाकिस्तान में अपनी पुश्तैनी हवेली और जमीन छोड़कर परिवार के साथ भारत आ गए थे। अब इतिहास से जुड़ा नाम रखने वाले राजस्थान के छाछरो गांव में उन्हें सरपंच चुना गया है। यह कहानी सीमावर्ती क्षेत्र के इतिहास, परिवार की विरासत और 1971 के युद्ध से जुड़े घटनाक्रम को सामने लाती है।
338 वोट से दर्ज की जीत
छाछरो गांव में 24 अक्टूबर को हुए सरपंच चुनाव में पदमसिंह सोढ़ा ने जीत हासिल की। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनके प्रतिद्वंद्वी धना राम को 612 वोट मिले, जबकि पदमसिंह ने 338 वोट के अंतर से चुनाव जीता। उनकी जीत के बाद गांव और आसपास के क्षेत्रों में उनके परिवार के पुराने इतिहास की चर्चा होने लगी है।पदमसिंह की पहचान केवल एक जनप्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि 1971 के युद्ध से जुड़े एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर भी है, जिनका परिवार सीमा पार अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़कर भारत आया था। उनके सरपंच बनने से छाछरो नाम के पीछे छिपा ऐतिहासिक संदर्भ भी चर्चा में आया है।
पाकिस्तान में पुश्तैनी हवेली पर फहराया था तिरंगा
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पदमसिंह सोढ़ा ने पाकिस्तान स्थित छाछरो गांव में अपनी पुश्तैनी हवेली पर भारतीय तिरंगा फहराया था। बताया जाता है कि इस घटना के बाद पाकिस्तान ने पदमसिंह और उनके भाई लक्ष्मणसिंह पर जासूसी के आरोप लगाए थे। दोनों भाइयों पर दो-दो लाख रुपये का इनाम भी घोषित किया गया था।युद्ध के दौरान भारतीय सेना की मदद करने के आरोपों के बाद उनके लिए पाकिस्तान में रहना मुश्किल हो गया। इसके बाद पदमसिंह सोढ़ा करीब 55 साल पहले अपनी पुश्तैनी हवेली और जमीन छोड़कर परिवार के साथ भारत आ गए। सीमा पार छूट गई संपत्ति और गांव की यादें उनके परिवार के इतिहास का हिस्सा बन गईं।
डेढ़ साल पहले बना नया राजस्व गांव छाछरो
राजस्थान में करीब डेढ़ साल पहले छाछरो (बावड़ी कला) नाम से नया राजस्व गांव बनाया गया था। इस गांव का नाम क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से जुड़े इतिहास को सम्मान देने के उद्देश्य से रखा गया।अब इसी गांव में पदमसिंह सोढ़ा का सरपंच चुना जाना एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। जिस छाछरो नाम का संबंध उनकी पुश्तैनी जमीन और युद्धकालीन घटनाओं से रहा, उसी नाम वाले गांव की जिम्मेदारी अब उनके हाथों में आई है।
युद्ध की यादों से जुड़ी है परिवार की कहानी
पदमसिंह सोढ़ा की कहानी भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद सीमावर्ती परिवारों के सामने आई चुनौतियों और 1971 के युद्ध के दौरान बने हालात की याद दिलाती है। पाकिस्तान में पुश्तैनी संपत्ति छोड़कर भारत आने के बाद अब उनका सरपंच बनना उनके जीवन का नया अध्याय है।छाछरो गांव के नाम के जरिए ऐतिहासिक विरासत को पहचान देने की कोशिश और पदमसिंह सोढ़ा की चुनावी जीत ने इस कहानी को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।
