13 दिनों तक रंगों में सराबोर रहेगा मेवाड़, भीलवाड़ा में दिखेगा पारंपरिक होली उत्सव
मेवाड़ अपनी आन-बान-शान के साथ-साथ अपनी अनूठी लोक परंपराओं के लिए भी विश्व विख्यात है। जहां देशभर में होलिका दहन के अगले दिन धुलंडी के साथ रंगों का उत्सव थम जाता है, वहीं वस्त्र नगरी भीलवाड़ा सहित पूरे मेवाड़ अंचल में होली का उल्लास अगले 13 दिनों तक परवान पर रहेगा। यहां होली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक है।
मेवाड़ में होली की शुरुआत पारंपरिक होलिका दहन से होती है। इसके बाद धुलंडी पर रंग-गुलाल के साथ लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। लेकिन अन्य स्थानों के विपरीत यहां उत्सव का समापन यहीं नहीं होता। अगले कई दिनों तक गांवों और शहरों में गैर, गेर नृत्य, जुलूस और लोकगीतों की धूम बनी रहती है। ढोल-नगाड़ों की थाप पर थिरकते युवक-युवतियां और पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकार पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देते हैं।
भीलवाड़ा में अलग-अलग समाजों और संगठनों द्वारा होली के बाद विभिन्न तिथियों पर गैर निकाली जाती है। इन गैरों में बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज और रंगों की बौछार के बीच पूरा शहर मानो रंगों की चादर में लिपट जाता है। बाजारों में रौनक बढ़ जाती है और दूर-दराज से लोग इस अनूठी परंपरा को देखने पहुंचते हैं।
इतिहासकारों के अनुसार, मेवाड़ की होली पर रियासतकालीन परंपराओं की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। राजपरिवारों के समय से चली आ रही कई रस्में आज भी निभाई जाती हैं। सामाजिक समरसता और सामूहिक सहभागिता इस उत्सव की विशेष पहचान है। हर वर्ग, हर आयु का व्यक्ति इसमें भाग लेकर इस परंपरा को जीवंत बनाए रखता है।
होली के इन 13 दिनों के दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है। कई स्थानों पर फागोत्सव, भजन संध्या और पारंपरिक नृत्य-गीतों की प्रस्तुतियां होती हैं। इससे नई पीढ़ी को भी अपनी लोक संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलता है।
