जयपुर में पार्षद बनना होगा मुश्किल, 100 वार्ड घटने से बढ़ा मुकाबला; वीडियो में जाने सबसे बड़े वार्ड में 30 हजार से ज्यादा वोटर
जयपुर में इस बार नगर निगम चुनाव में पार्षद बनने की राह पहले के मुकाबले काफी मुश्किल होने वाली है। परिसीमन के बाद जयपुर नगर निगम में वार्डों की संख्या 250 से घटाकर 150 कर दी गई है। वार्डों की संख्या कम होने के साथ ही प्रत्येक वार्ड का दायरा बढ़ गया है। इसका सीधा असर वोटर्स की संख्या पर पड़ा है। अब कई वार्डों में 20 हजार से ज्यादा मतदाता हैं, जबकि सबसे बड़े वार्ड में वोटर्स की संख्या 30 हजार से भी अधिक है।नगर निगम के 150 वार्डों में वर्ष 2020 के मुकाबले 2026 में कुल 2 लाख 62 हजार 546 वोटर्स बढ़े हैं। दूसरी ओर वार्डों की संख्या 250 से घटकर 150 रह गई। यानी पहले की तुलना में अब कम वार्डों में ज्यादा मतदाता शामिल हैं। ऐसे में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के सामने ज्यादा मतदाताओं तक पहुंचने और अपना जनाधार मजबूत करने की चुनौती होगी।
परिसीमन के बाद वार्डों के आकार में भी बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। जयपुर नगर निगम का सबसे बड़ा वार्ड झोटवाड़ा विधानसभा क्षेत्र का वार्ड नंबर 26 है। यहां कुल 30 हजार 572 वोटर्स हैं। इतने बड़े वोट बैंक वाले वार्ड में चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवारों को बड़े क्षेत्र में प्रचार करना होगा और ज्यादा मतदाताओं तक पहुंच बनानी होगी।वहीं दूसरी तरफ सिविल लाइंस विधानसभा क्षेत्र का वार्ड नंबर 93 सबसे छोटा वार्ड है। यहां सिर्फ 4 हजार 838 वोटर्स हैं। सबसे बड़े और सबसे छोटे वार्ड के बीच वोटर्स की संख्या में बड़ा अंतर है। इससे साफ है कि परिसीमन के बाद जयपुर नगर निगम के वार्डों का आकार और मतदाता संख्या समान नहीं है।
नगर निगम के आंकड़ों के मुताबिक 150 वार्डों में से 28 वार्ड ऐसे हैं, जहां 20 हजार से ज्यादा वोटर्स हैं। इन वार्डों में पार्षद पद के उम्मीदवारों के सामने मतदाताओं के बड़े समूह तक पहुंचने की चुनौती रहेगी। बड़े वार्डों में प्रचार का क्षेत्र बढ़ने के साथ चुनावी रणनीति और संगठन को भी मजबूत रखना होगा।जयपुर जिले की 16 नगर पालिकाओं की तुलना में भी नगर निगम के कई वार्डों की आबादी और वोटर संख्या काफी ज्यादा है। कुछ वार्ड ऐसे हैं, जहां मतदाताओं की संख्या जिले की कई नगर पालिकाओं के कुल वोटर्स से भी अधिक है। इससे नगर निगम चुनाव में वार्ड स्तर की राजनीति का दायरा और महत्व बढ़ गया है।
वार्डों की संख्या घटने से राजनीतिक दलों में टिकट वितरण को लेकर भी मुकाबला तेज होने की संभावना है। पहले जहां 250 वार्डों में पार्षद पद के लिए अधिक सीटें थीं, अब 150 वार्डों में ही उम्मीदवारों को मौका मिलेगा। ऐसे में टिकट के दावेदारों की संख्या और उपलब्ध सीटों के बीच अंतर बढ़ सकता है।वहीं बड़े वार्डों में जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे, संगठन की पकड़ और व्यक्तिगत जनसंपर्क चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभा सकते हैं। उम्मीदवारों को पहले की तुलना में ज्यादा मतदाताओं तक पहुंचना होगा।कुल मिलाकर परिसीमन के बाद जयपुर नगर निगम चुनाव का गणित पूरी तरह बदल गया है। 250 की जगह 150 वार्ड और 2.62 लाख से ज्यादा नए वोटर्स ने मुकाबले का दायरा बढ़ा दिया है। ऐसे में इस बार पार्षद बनने की लड़ाई न केवल राजनीतिक दलों के लिए बल्कि हर उम्मीदवार के लिए पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहने वाली है।
