रणथंभौर के रोचक FACTS VIDEO एक ही जंगल में बाघ, किला और झीलें, जानिए टाइगर रिजर्व की अनोखी कहानी
राजस्थान का रणथंभौर टाइगर रिजर्व ऐसा वन्यजीव क्षेत्र है जहां प्रकृति और इतिहास एक साथ दिखाई देते हैं। सवाई माधोपुर के पास स्थित यह क्षेत्र रॉयल बंगाल टाइगर के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। जंगल के बीच मौजूद प्राचीन किले के अवशेष, झीलें और पहाड़ी इलाका रणथंभौर को दूसरे टाइगर रिजर्व से अलग पहचान देते हैं।
प्रोजेक्ट टाइगर के पहले नौ रिजर्वों में शामिल
रणथंभौर का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह भारत के शुरुआती टाइगर रिजर्वों में शामिल रहा। वर्ष 1973 में केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की थी। NTCA के अनुसार शुरुआत में देश के नौ टाइगर रिजर्व इस कार्यक्रम में शामिल किए गए थे और रणथंभौर उनमें से एक था। इस परियोजना का उद्देश्य बाघों और उनके प्राकृतिक आवास को संरक्षण देना था।
राष्ट्रीय उद्यान से टाइगर रिजर्व तक का सफर
रणथंभौर का मुख्य क्षेत्र 1980 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ। इसके बाद आसपास के जंगलों को भी अलग-अलग चरणों में संरक्षण व्यवस्था में शामिल किया गया। राजस्थान वन विभाग के अनुसार 1983 में सवाई मानसिंह और 1984 में कैलादेवी अभयारण्य अधिसूचित किए गए। बाद में ये क्षेत्र रणथंभौर टाइगर रिजर्व की संरचना का हिस्सा बने।
1,411 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा में फैला है रिजर्व
NTCA के मौजूदा आंकड़ों के अनुसार रणथंभौर टाइगर रिजर्व का कुल क्षेत्रफल 1,411.29 वर्ग किलोमीटर है। इसका 1,113.36 वर्ग किलोमीटर हिस्सा कोर क्षेत्र और 297.92 वर्ग किलोमीटर बफर क्षेत्र है। कोर क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि बफर क्षेत्र में संरक्षण के साथ नियंत्रित मानवीय गतिविधियों का प्रबंधन किया जाता है।
यहां सिर्फ बाघ ही नहीं रहते
रणथंभौर की जैव विविधता इसकी सबसे बड़ी ताकत है। राजस्थान वन विभाग के अनुसार रिजर्व में 38 स्तनधारी, 315 पक्षी, 14 सरीसृप और 402 पौधों की प्रजातियां दर्ज की गई हैं। सांभर और चीतल जैसे शाकाहारी जानवर बाघों के लिए महत्वपूर्ण शिकार प्रजातियां हैं। इसके अलावा तेंदुआ, नीलगाय, जंगली सूअर, मगरमच्छ और कई प्रकार के पक्षी भी यहां पाए जाते हैं।
बाघों की वजह से दुनिया भर में पहचान
रणथंभौर के बाघों ने इस क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव पर्यटन के नक्शे पर खास जगह दिलाई है। जंगल सफारी के दौरान बाघों को प्राकृतिक वातावरण में देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक यहां पहुंचते हैं। रणथंभौर से जुड़े बाघ संरक्षण के प्रयासों का प्रभाव राजस्थान के दूसरे क्षेत्रों तक भी पहुंचा है। NTCA के अनुसार 2008 और 2009 में रणथंभौर से बाघों को सरिस्का में स्थानांतरित किया गया था, ताकि वहां बाघों की आबादी को दोबारा स्थापित करने में मदद मिल सके।
इतिहास और जंगल का अनोखा मेल
रणथंभौर की खासियत केवल यहां घूमते बाघ नहीं हैं। एक तरफ प्राचीन रणथंभौर किला और ऐतिहासिक अवशेष हैं, तो दूसरी तरफ जंगल में स्वतंत्र रूप से घूमते वन्यजीव और पानी से भरी झीलें हैं।
यही वजह है कि रणथंभौर टाइगर रिजर्व को राजस्थान की ऐसी प्राकृतिक विरासत माना जाता है, जहां इतिहास, वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन तीनों एक ही स्थान पर दिखाई देते हैं।
