लुप्त होती ढूंढाड़ी कलम को बचाने की पहल, नई पीढ़ी को सिखाई जा रही जयपुर शैली की पारंपरिक चित्रकला
राजस्थान की समृद्ध कला परंपराओं में शामिल ढूंढाड़ी कलम को नई पीढ़ी से जोड़ने और संरक्षित करने की पहल शुरू की गई है। लुप्त होती जा रही इस पारंपरिक चित्रकला शैली को जीवित रखने के उद्देश्य से आयोजित चित्रकला शिविर में युवाओं और कला प्रेमियों को जयपुर शैली की बारीकियां सिखाई जा रही हैं। इस पारंपरिक चित्रकला शिविर में प्रसिद्ध कलाकार रामू रामदेव प्रतिभागियों को ढूंढाड़ी कलम की तकनीक, रंग संयोजन और चित्र निर्माण की विशेषताओं का प्रशिक्षण दे रहे हैं।
जयपुर शैली की बारीकियों से रूबरू हो रहे कलाकार
शिविर में प्रतिभागियों को ढूंढाड़ी कलम के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी जा रही है। इसमें पारंपरिक आकृतियां बनाना, प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल, महीन रेखांकन और चित्रों में भावनाओं को उकेरने की कला शामिल है।प्रशिक्षण के दौरान कलाकारों को जयपुर शैली की उन विशेषताओं से भी अवगत कराया जा रहा है, जिनमें सूक्ष्म चित्रांकन और ऐतिहासिक विषयों का सुंदर चित्रण प्रमुख है।
नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास
आयोजकों का कहना है कि आधुनिक दौर में पारंपरिक कलाओं के प्रति युवाओं की रुचि कम होती जा रही है। ऐसे में इस तरह के शिविरों के माध्यम से पुरानी कला विधाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।ढूंढाड़ी कलम राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी एक महत्वपूर्ण चित्रकला शैली है, लेकिन पर्याप्त संरक्षण और प्रचार-प्रसार के अभाव में यह धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है।
कलाकार रामू रामदेव दे रहे प्रशिक्षण
शिविर में वरिष्ठ कलाकार रामू रामदेव अपने अनुभव और तकनीकों को प्रतिभागियों के साथ साझा कर रहे हैं। वे उन्हें पारंपरिक चित्रकला के मूल सिद्धांतों के साथ-साथ आधुनिक समय में इस कला को आगे बढ़ाने के तरीकों की जानकारी भी दे रहे हैं।उनका उद्देश्य है कि ज्यादा से ज्यादा युवा इस कला से जुड़ें और राजस्थान की इस अनमोल विरासत को आगे बढ़ाएं।
कला संरक्षण की दिशा में अहम कदम
कला विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक चित्रकला शैलियों को बचाने के लिए प्रशिक्षण शिविर, प्रदर्शनियां और जागरूकता कार्यक्रम बेहद जरूरी हैं। इससे न केवल कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर मिलता है।ढूंढाड़ी कलम को लेकर शुरू की गई यह पहल राजस्थान की कला और संस्कृति को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इस तरह के प्रयासों से उम्मीद है कि यह पारंपरिक कला शैली फिर से नई पहचान हासिल कर सकेगी।
