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रणथंभौर कैसे बना राजस्थान की ‘टाइगर फैक्ट्री’, कभी बाघों का दिखना था बेहद दुर्लभ

रणथंभौर कैसे बना राजस्थान की ‘टाइगर फैक्ट्री’, कभी बाघों का दिखना था बेहद दुर्लभ
 
रणथंभौर कैसे बना राजस्थान की ‘टाइगर फैक्ट्री’, कभी बाघों का दिखना था बेहद दुर्लभ

राजस्थान का रणथंभौर आज दुनिया के सबसे चर्चित टाइगर रिजर्व में शामिल है। यहां बाघों की मौजूदगी और आसानी से होने वाली टाइगर साइटिंग ने इसे देश-विदेश के वन्यजीव प्रेमियों के बीच खास पहचान दिलाई है। लेकिन रणथंभौर की कहानी हमेशा ऐसी नहीं थी। एक दौर ऐसा भी था, जब यहां बाघों का दिखना बेहद दुर्लभ माना जाता था। लगातार संरक्षण, जंगलों में मानवीय दखल कम करने और बाघों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार होने के बाद रणथंभौर ने धीरे-धीरे अपनी तस्वीर बदल दी।

रणथंभौर का इतिहास इसके किले से भी गहराई से जुड़ा है। राजस्थान पर्यटन के अनुसार रणथंभौर किले का निर्माण चौहान शासकों के दौर में हुआ था और यह क्षेत्र सदियों से ऐतिहासिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। आज यही किला रणथंभौर के जंगलों की पहचान का अहम हिस्सा है।

वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से रणथंभौर की कहानी 1950 के दशक में महत्वपूर्ण मोड़ लेती है। वर्ष 1955 में इस क्षेत्र को सवाई माधोपुर गेम सेंक्चुरी के रूप में विकसित किया गया। इसके बाद संरक्षण व्यवस्था मजबूत होती गई और वर्ष 1973 में इसे प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल किया गया। इसी दौर से बाघों के संरक्षण को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने की शुरुआत हुई।

शुरुआती वर्षों में रणथंभौर में बाघों की संख्या बहुत अधिक नहीं थी। 1970 के दशक में यहां बाघों को देख पाना काफी मुश्किल था। जंगलों को संरक्षण मिलने और शिकार पर रोक सख्त होने के साथ हालात बदलने लगे। 1980 के दशक के मध्य तक रणथंभौर दुनिया में जंगली बाघों को देखने के लिए प्रमुख स्थानों में गिना जाने लगा।

रणथंभौर के विस्तार ने भी बाघों को बेहतर आवास उपलब्ध कराया। वर्ष 1983 में राष्ट्रीय उद्यान के उत्तर में स्थित करीब 647 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कैलादेवी अभयारण्य के रूप में शामिल किया गया। इसके बाद 1984 में दक्षिण की ओर लगभग 130 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को सवाई मानसिंह अभयारण्य बनाया गया। इन क्षेत्रों के जुड़ने से बाघों के लिए बड़ा और सुरक्षित आवास तैयार हुआ।

हालांकि बाघों की यह बढ़ती आबादी हमेशा सुरक्षित नहीं रही। 1990 के दशक की शुरुआत में रणथंभौर में बड़े पैमाने पर अवैध शिकार की घटनाएं सामने आईं। बाघों की खाल और शरीर के अंगों की तस्करी ने संरक्षण व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी। वन विभाग की सख्ती और शिकारियों पर कार्रवाई के बाद स्थिति धीरे-धीरे नियंत्रण में आई और बाघों की संख्या फिर बढ़ने लगी।

बाघों के लिए जंगल में जगह बढ़ाने की दिशा में गांवों का पुनर्वास भी महत्वपूर्ण रहा। 2008 से 2018 के बीच राष्ट्रीय उद्यान के भीतर मौजूद शेष चार गांवों को बाहर स्थानांतरित किया गया। इससे बाघों के लिए उपयुक्त प्राकृतिक आवास में विस्तार हुआ और वन्यजीवों को अपेक्षाकृत शांत वातावरण मिला।

यही वजह है कि रणथंभौर को राजस्थान की ‘टाइगर फैक्ट्री’ कहने की कहानी सिर्फ बाघों की संख्या बढ़ने की कहानी नहीं है। यह दशकों तक चले संरक्षण, जंगलों की सुरक्षा, शिकार पर नियंत्रण और प्राकृतिक आवास को मजबूत करने का परिणाम है। आज रणथंभौर टाइगर रिजर्व में रणथंभौर नेशनल पार्क के साथ सवाई मानसिंह और कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं।

रणथंभौर की पहचान अब सिर्फ बाघों तक सीमित नहीं है। यहां तेंदुए, नीलगाय, चीतल, मगरमच्छ और अनेक पक्षी प्रजातियां भी पाई जाती हैं। बाघ संरक्षण की सफलता के साथ यह क्षेत्र राजस्थान के प्रमुख वन्यजीव पर्यटन केंद्रों में भी बदल चुका है। हाल में यहां बाघों के इलाज और संरक्षण के लिए राजस्थान का पहला टाइगर रिजर्व वेटरनरी हॉस्पिटल भी तैयार किया गया है, जो संरक्षण के बदलते स्वरूप को दिखाता है।

इस तरह कभी जहां बाघों की मौजूदगी दुर्लभ थी, वही रणथंभौर आज बाघों की दहाड़ और उनकी शानदार साइटिंग के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यही लंबा सफर रणथंभौर को राजस्थान की ‘टाइगर फैक्ट्री’ की पहचान देता है।