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कुंभलगढ़ किले का इतिहास: 36 किलोमीटर लंबी दीवार, महाराणा प्रताप की जन्मभूमि और मेवाड़ की अभेद्य विरासत

कुंभलगढ़ किले का इतिहास: 36 किलोमीटर लंबी दीवार, महाराणा प्रताप की जन्मभूमि और मेवाड़ की अभेद्य विरासत
 
कुंभलगढ़ किले का इतिहास: 36 किलोमीटर लंबी दीवार, महाराणा प्रताप की जन्मभूमि और मेवाड़ की अभेद्य विरासत

राजस्थान के राजसमंद जिले में अरावली की ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित कुंभलगढ़ दुर्ग राजस्थान के सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक किलों में शामिल है। अपनी विशाल प्राचीर, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और स्थापत्य कला के कारण यह किला सदियों से लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा है। इसे मेवाड़ की सैन्य शक्ति और राजपूत स्थापत्य का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। कुंभलगढ़ को उसकी विशाल दीवार के कारण कई बार ‘भारत की महान दीवार’ भी कहा जाता है। इसकी प्राचीर लगभग 36 किलोमीटर तक फैली हुई बताई जाती है। कई स्थानों पर दीवार इतनी चौड़ी है कि उस पर एक साथ कई घोड़े चल सकते थे।

महाराणा कुंभा ने कराया था निर्माण

कुंभलगढ़ दुर्ग का वर्तमान स्वरूप मेवाड़ के शासक महाराणा कुंभा के शासनकाल में विकसित हुआ। इतिहासकारों के अनुसार किले के निर्माण का प्रमुख चरण 15वीं शताब्दी में हुआ। इसका निर्माण मेवाड़ की सुरक्षा को मजबूत करने और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखने के उद्देश्य से कराया गया था।अरावली की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित होने के कारण किले को प्राकृतिक सुरक्षा भी प्राप्त थी। दुर्ग की ऊंचाई और मजबूत दीवारों ने इसे बाहरी हमलों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महाराणा प्रताप की जन्मभूमि

कुंभलगढ़ का नाम मेवाड़ के महान योद्धा महाराणा प्रताप से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ में हुआ था। यही कारण है कि यह दुर्ग राजस्थान के इतिहास और राजपूत गौरव में विशेष स्थान रखता है।महाराणा प्रताप ने मुगल सम्राट अकबर के खिलाफ मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया। उनके जीवन से जुड़े इस किले के कारण कुंभलगढ़ देशभर के इतिहास प्रेमियों के लिए खास महत्व रखता है।

अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था

किले में कई विशाल प्रवेश द्वार बनाए गए थे। राम पोल, हनुमान पोल और पाघरा पोल जैसे द्वार इसकी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा थे। किले के भीतर महल, मंदिर, जलाशय और सैनिकों के रहने की व्यवस्थाएं भी थीं।कुंभलगढ़ परिसर में बड़ी संख्या में मंदिर होने की जानकारी मिलती है। इनमें हिंदू और जैन परंपरा से जुड़े मंदिर शामिल हैं। इससे उस दौर की धार्मिक और स्थापत्य विविधता का भी पता चलता है।

विशाल प्राचीर है सबसे बड़ी पहचान

कुंभलगढ़ की सबसे खास पहचान इसकी विशाल प्राचीर है। करीब 36 किलोमीटर लंबी दीवार पहाड़ियों के उतार-चढ़ाव के साथ किले को चारों ओर से घेरती है। दीवार के कई हिस्से आज भी काफी मजबूत स्थिति में दिखाई देते हैं।इसी विशाल दीवार की तुलना अक्सर चीन की महान दीवार से की जाती है। हालांकि दोनों की लंबाई और निर्माण का उद्देश्य अलग है, लेकिन कुंभलगढ़ की प्राचीर अपने आप में अद्भुत स्थापत्य उपलब्धि है।

आज प्रमुख पर्यटन स्थल

आज कुंभलगढ़ राजस्थान के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है। किले से अरावली पर्वतमाला का शानदार दृश्य दिखाई देता है। शाम के समय होने वाला लाइट एंड साउंड शो भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है।कुंभलगढ़ दुर्ग केवल पत्थरों से बनी एक ऐतिहासिक इमारत नहीं है, बल्कि यह मेवाड़ की सैन्य रणनीति, राजपूत वीरता और राजस्थान की स्थापत्य विरासत की कहानी कहता है। महाराणा कुंभा से लेकर महाराणा प्रताप तक, इस दुर्ग की दीवारों में मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास की अनेक परतें आज भी दिखाई देती हैं।