देश में 826 देसी उत्पादों के GI टैग आवेदन लंबित, किसानों और MSME को नहीं मिल रहा लाभ
राज्य सरकारों की तैयारी और आवश्यक दस्तावेजी सबूतों की कमी के कारण देश में 826 देसी उत्पादों के भौगोलिक संकेतक (GI) टैग के आवेदन लंबित पड़े हैं। इसमें कोटा स्टोन, भोपाली बटुआ, इंदौरी जीरावन जैसे प्रमुख उत्पाद शामिल हैं। इस देरी के चलते किसानों, कुटीर उद्योगों और MSME सेक्टर को संभावित बाजार और रोजगार के अवसरों का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, GI टैग किसी उत्पाद की विशिष्टता और उत्पत्ति को प्रमाणित करता है। इसे मिलने के बाद उत्पाद की मांग बढ़ती है और उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर कीमत मिलती है। लंबित आवेदन और प्रक्रियात्मक देरी के कारण यह लाभ उत्पादकों तक नहीं पहुँच पा रहा।
किसानों और कुटीर उद्योग संचालकों का कहना है कि GI टैग मिलने से उनके उत्पादों की ब्रांडिंग मजबूत होगी और वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे। उदाहरण के लिए, कोटा स्टोन और भोपाली बटुए की मांग देश और विदेश में बढ़ रही है, लेकिन टैग के अभाव में इसकी कीमत और बाजार पहुंच सीमित है।
अधिकारियों का कहना है कि आवेदन लंबित होने का मुख्य कारण राज्य स्तर पर दस्तावेजी तैयारी और प्रमाणों की कमी है। कई राज्यों में GI टैग आवेदन को समय पर प्रस्तुत करने और आवश्यक सबूत संकलित करने में दिक्कतें आ रही हैं। इसके अलावा, प्रक्रिया में तकनीकी और प्रशासनिक जटिलताएं भी लंबित रहने का कारण बन रही हैं।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि राज्य सरकारों को किसानों, कुटीर उद्योग और MSME संचालकों के साथ मिलकर GI टैग प्रक्रिया को तेज करना चाहिए। दस्तावेजी तैयारी और प्रमाणों का सही प्रबंधन होने पर लंबित आवेदन जल्द ही निपटाए जा सकते हैं।
कुल मिलाकर, देश में 826 देसी उत्पादों के GI टैग आवेदन लंबित होने से किसानों और छोटे उद्योगों को आर्थिक और बाजार संबंधी अवसरों में नुकसान हो रहा है। इस दिशा में सक्रिय प्रयासों और प्रशासनिक सहयोग से ही उत्पादकों को उनके उत्पाद की पहचान और लाभ मिल सकता है।
