जयपुर में करोड़ों की सरकारी जमीन पर खेल! स्कूल के लिए आरक्षित भूमि के बांट दिए पट्टे, सरपंच और ग्राम विकास अधिकारी पर गंभीर आरोप
राजधानी जयपुर के जमवारामगढ़ उपखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत धोला में सरकारी जमीन से जुड़े कथित बड़े घोटाले का मामला सामने आया है। आरोप है कि आबादी विस्तार योजना की आड़ में पंचायत प्रशासन ने महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय (अंग्रेजी माध्यम) के लिए आरक्षित बेशकीमती सरकारी भूमि के पट्टे जारी कर दिए। इस मामले में ग्राम पंचायत के सरपंच और ग्राम विकास अधिकारी की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत धोला के तिबारा की ढाणी क्षेत्र में स्थित सरकारी भूमि को महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय (अंग्रेजी माध्यम) के लिए चिन्हित किया गया था। आरोप है कि इसके बावजूद पंचायत प्रशासन ने उपखंड अधिकारी (एसडीएम) के स्पष्ट आदेशों की अनदेखी करते हुए उसी जमीन के आवासीय पट्टे जारी कर दिए।
बताया जा रहा है कि एसडीएम ने आबादी विस्तार के तहत जारी होने वाले पट्टों को अहस्तांतरणीय (Non-Transferable) रखने के निर्देश दिए थे, ताकि लाभार्थी इन भूखंडों को आगे बेच न सकें और केवल वास्तविक जरूरतमंदों को ही इसका लाभ मिले। लेकिन आरोप है कि ग्राम पंचायत ने नियमों को दरकिनार करते हुए हस्तांतरणीय (Transferable) पट्टे जारी कर दिए।
आरोपों के मुताबिक, पट्टे जारी होने के बाद संबंधित भूखंडों को बाजार में ऊंचे दामों पर बेच दिया गया, जिससे सरकारी संपत्ति को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने पंचायत स्तर पर भूमि आवंटन प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि विद्यालय के लिए आरक्षित भूमि पर ही आवासीय पट्टे जारी कर दिए गए हैं, तो भविष्य में स्कूल के विस्तार और अन्य शैक्षणिक सुविधाओं के विकास पर भी असर पड़ सकता है। उनका आरोप है कि सरकारी भूमि का दुरुपयोग कर कुछ लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।
मामले के सामने आने के बाद प्रशासनिक स्तर पर जांच की मांग तेज हो गई है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि उपखंड अधिकारी के आदेशों की अवहेलना कर नियमों के विपरीत पट्टे जारी किए गए हैं, तो इसकी निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
अब सभी की निगाहें प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो न केवल विवादित पट्टे निरस्त किए जा सकते हैं, बल्कि सरपंच, ग्राम विकास अधिकारी और इस प्रक्रिया में शामिल अन्य जिम्मेदार लोगों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई संभव है। यह मामला ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी जमीन के आवंटन और पंचायत प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
