पूर्व विधायक हेतराम बेनीवाल का निधन, आज शाम पैतृक गांव में होगा अंतिम संस्कार
राजस्थान की राजनीति, खासकर किसानों और मजदूरों के संघर्ष का एक सुनहरा चैप्टर आज खत्म हो गया। जाने-माने CPI(M) नेता और पूर्व MLA हेतराम बेनीवाल का सोमवार रात (23 फरवरी) को 94 साल की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे राज्य में, खासकर उत्तरी राजस्थान के किसानों और लेफ्ट हलकों में शोक की लहर दौड़ गई।
उन्होंने टांटिया हॉस्पिटल में आखिरी सांस ली
पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक, पूर्व MLA हेतराम ने सोमवार रात 10:58 बजे टांटिया हॉस्पिटल में आखिरी सांस ली। वे पिछले तीन दिनों से हीमोग्लोबिन की कमी के कारण वहां भर्ती थे। इलाज के दौरान, खून चढ़ाने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई, जिससे उन्हें निमोनिया हो गया।
उनका पार्थिव शरीर दोपहर करीब 12:30 बजे उनके घर 8 LNP लाया गया। उनका अंतिम संस्कार आज, मंगलवार, शाम 4 बजे उनके पैतृक गांव 8 LNP में किया जाएगा। संघर्षों से भरा पॉलिटिकल सफ़र
16 अक्टूबर, 1932 को जन्मे हेतराम बेनीवाल किसान और मज़दूर राजनीति में एक जाने-माने चेहरे थे। उन्होंने अपना पहला चुनाव 1967 में CPI(M) के टिकट पर संगरिया असेंबली सीट से लड़ा था। 1977 में उन्हें टिकट नहीं मिला और वे चुनाव नहीं लड़ सके। 1990-91 में वे संगरिया असेंबली सीट से MLA चुने गए, लेकिन असेंबली भंग होने की वजह से उनका कार्यकाल सिर्फ़ ढाई साल ही चला। बाद में, जब संगरिया सीट को फिर से बनाया गया और सादुलशहर असेंबली सीट बनी, तो उन्होंने 2004 में आखिरी बार चुनाव लड़ा।
बेनीवाल एडमिनिस्ट्रेशन के लिए 'पहेली' थे।
हेतराम बेनीवाल न सिर्फ़ एक पॉलिटिशियन थे बल्कि एक कुशल स्ट्रैटेजिस्ट भी थे। उन्होंने राजस्थान कैनाल लैंड अलॉटमेंट मूवमेंट, घड़साना किसान मूवमेंट, JCT मिल वर्कर्स मूवमेंट और भाखड़ा और गंगा कैनाल से जुड़े कई किसान आंदोलनों को लीड किया। उन्हें दलितों, मजदूरों और किसानों के संघर्ष की आवाज़ माना जाता था। अपने समर्थकों के बीच उन्हें गरीबों का मसीहा कहा जाता था। बेनीवाल के आंदोलनों की स्ट्रैटेजी को समझना हमेशा से ही प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती रही है। उन्होंने ज़मीनी स्तर पर मजदूरों और किसानों को इस तरह एकजुट किया कि सरकार को झुकना पड़ा।
निजी जीवन और विरासत
हेतराम बेनीवाल अपने पीछे दो बेटों और एक बेटी का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनकी पत्नी चंद्रावली देवी का पिछले साल निधन हो गया था। उनके निधन से राजस्थान ने एक ऐसा नेता खो दिया है जो बिना किसी दिखावे के "गरीबों के मसीहा" के तौर पर जीवन भर सक्रिय रहे।
