हर साल 1 करोड़ खर्च, फिर भी शुरू नहीं हो पाई बाबा आमटे दिव्यांग यूनिवर्सिटी: 3.27 करोड़ खर्च पर उठे सवाल
दिव्यांगों के सशक्तिकरण और उच्च शिक्षा के उद्देश्य से शुरू की गई बाबा आमटे दिव्यांग यूनिवर्सिटी पिछले तीन वर्षों बाद भी पूरी तरह से शुरू नहीं हो पाई है। हैरान करने वाली बात यह है कि यूनिवर्सिटी के संचालन पर हर साल करीब 1 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, इसके बावजूद शैक्षणिक गतिविधियां अभी तक शुरू नहीं हो सकी हैं।
सूत्रों और उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यूनिवर्सिटी के कुलगुरु, रजिस्ट्रार सहित कुल 6 अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, कार्यालय संचालन, गाड़ियों के उपयोग, एसी-फर्नीचर की खरीद और ऑफिस किराए जैसे मदों में अब तक करीब 3.27 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद यूनिवर्सिटी का मूल उद्देश्य—दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए शैक्षणिक संस्थान का संचालन—अभी तक धरातल पर नहीं उतर सका है।
बताया जा रहा है कि यूनिवर्सिटी का अस्तित्व तीन साल पहले हुआ था, लेकिन तब से लेकर अब तक न तो पूर्ण शैक्षणिक ढांचा तैयार हो पाया है और न ही नियमित कक्षाओं की शुरुआत हो सकी है। इस देरी ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर भी गंभीर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
स्थानीय स्तर पर इस मामले को लेकर असंतोष भी बढ़ रहा है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी संस्थान पर लगातार वित्तीय संसाधन खर्च किए जा रहे हों, तो उसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से धरातल पर दिखना चाहिए। लेकिन इस मामले में स्थिति इसके विपरीत नजर आ रही है।
सूत्रों के अनुसार, यूनिवर्सिटी के संचालन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे, जैसे स्थायी कैंपस, पर्याप्त स्टाफ और शैक्षणिक पाठ्यक्रमों का विकास अभी भी अधूरा है। यही कारण है कि संस्था केवल प्रशासनिक खर्चों तक सीमित होकर रह गई है।
इस पूरे मामले ने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी प्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआत में ही स्पष्ट रोडमैप और समयबद्ध लक्ष्य तय किए जाते, तो आज यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
वहीं, इस मुद्दे पर अब प्रशासनिक स्तर पर भी चर्चा तेज हो गई है। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में यूनिवर्सिटी के संचालन को लेकर कोई ठोस निर्णय लिया जा सकता है, ताकि दिव्यांग छात्रों के लिए इसका वास्तविक लाभ सुनिश्चित हो सके।
फिलहाल बाबा आमटे दिव्यांग यूनिवर्सिटी का यह मामला सरकारी योजनाओं की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर एक बड़ा सवाल बनकर सामने आया है, जिस पर पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
