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आसींद के स्वर्ण कलाकार ने ठाकुर जी के लिए चांदी का विशेष “आधार कार्ड” तैयार किया

आसींद के स्वर्ण कलाकार ने ठाकुर जी के लिए चांदी का विशेष “आधार कार्ड” तैयार किया
 
आसींद के स्वर्ण कलाकार ने ठाकुर जी के लिए चांदी का विशेष “आधार कार्ड” तैयार किया

राजस्थान के आसींद कस्बे के स्वर्ण कलाकार धनराज सोनी ने अपनी कलाकारी से भक्ति का अनूठा उदाहरण पेश किया है। सोनी ने मेवाड़ के प्रसिद्ध ठाकुर जी श्री सांवरिया सेठ के लिए चांदी का एक विशेष “आधार कार्ड” तैयार किया है, जिसे देखकर भक्तजन और कला प्रेमी प्रशंसा कर रहे हैं।

धनराज सोनी लंबे समय से पारंपरिक और धार्मिक कलाओं में माहिर हैं। उनके द्वारा बनाई गई कलाकृति न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि उसमें सूक्ष्म शिल्पकला और अत्यंत निपुण कारीगरी का भी उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिलता है। सोनी ने बताया कि यह “आधार कार्ड” खासतौर पर ठाकुर जी के लिए भक्ति और श्रद्धा के भाव को दर्शाने के लिए तैयार किया गया है।

स्थानीय कलाकारों और भक्तों का कहना है कि सोनी की यह कलाकृति राजस्थान के स्वर्ण और चांदी कला में न केवल नवाचार की मिसाल है, बल्कि धार्मिक कला और भक्ति का एक अद्वितीय मिश्रण भी है। उन्होंने बताया कि कार्ड की डिजाइन में परंपरागत झांकियां, धार्मिक प्रतीक और चांदी की बारीक नक़्क़ाशी की गई है, जो इसे और भी विशिष्ट बनाती है।

धनराज सोनी ने कहा, “मेवाड़ की परंपरा और ठाकुर जी की भक्ति को ध्यान में रखते हुए इस कलाकृति को तैयार किया है। यह केवल एक कला का नमूना नहीं है, बल्कि भक्ति की भावना को भी सामने लाता है।” उन्होंने यह भी बताया कि इस प्रकार की कलाकृतियों में समय, धैर्य और सूक्ष्म कौशल की आवश्यकता होती है।

स्थानीय समाज और कला प्रेमियों ने सोनी की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस तरह की कलाकृतियां न केवल धार्मिक आयोजनों और पूजा में महत्व रखती हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए कला और संस्कृति का एक अमूल्य दस्तावेज भी बनती हैं। इसके माध्यम से पारंपरिक शिल्प और धार्मिक भक्ति के प्रतीकों को संरक्षित किया जा सकता है।

मंदिर प्रबंधन ने भी इस कलाकृति की सराहना की है और इसे विशेष स्थान पर रखने की योजना बनाई है, ताकि भक्तजन और पर्यटक इसे देख सकें। मंदिर अधिकारियों ने बताया कि इस तरह की कलाकृतियों से धार्मिक स्थल की शोभा बढ़ती है और भक्तों के अनुभव में आध्यात्मिकता का भाव और प्रबल होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि राजस्थान में स्वर्ण और चांदी के पारंपरिक शिल्प की परंपरा सदियों पुरानी है। आसींद जैसे छोटे कस्बों में रहने वाले कलाकार अपनी कारीगरी के माध्यम से न केवल लोक कलाओं को जीवित रखते हैं, बल्कि उन्हें आधुनिक दृष्टि और नवाचार के साथ प्रस्तुत करते हैं।

धनराज सोनी की यह कलाकृति इस बात का उदाहरण है कि भक्ति और कला का मेल कितना सुंदर और प्रेरणादायक हो सकता है। इस कलाकृति को देखकर स्थानीय समाज में भी कला और धार्मिकता के प्रति जागरूकता बढ़ रही है।