जयपुर के जंतर-मंतर में आज होगा आषाढ़ी वायु धारणी पूर्णिमा परंपरागत वायु परीक्षण, बारिश का लगाया जाएगा अनुमान
जयपुर के ऐतिहासिक और विश्व धरोहर स्थल जंतर-मंतर में बुधवार शाम 29 जुलाई को आषाढ़ी वायु धारणी पूर्णिमा के अवसर पर पारंपरिक वायु परीक्षण किया जाएगा। इस विशेष आयोजन में विशेषज्ञ प्राकृतिक संकेतों के आधार पर आने वाले समय में बारिश की स्थिति का अनुमान लगाएंगे। ध्वज पूजन के बाद वायु की दिशा, गति और वातावरण में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया जाएगा।
राजस्थान में मानसून के दौरान आषाढ़ी वायु धारणी पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। प्राचीन समय से ही खगोलीय और प्राकृतिक संकेतों के आधार पर मौसम का अनुमान लगाने की परंपरा रही है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जयपुर के जंतर-मंतर में हर साल वायु परीक्षण किया जाता है।
ध्वज पूजन के बाद शुरू होगा परीक्षण
कार्यक्रम की शुरुआत विधि-विधान से ध्वज पूजन के साथ होगी। इसके बाद विशेषज्ञ जंतर-मंतर की प्राचीन वेधशाला में मौजूद यंत्रों और प्राकृतिक संकेतों के आधार पर वायु का अध्ययन करेंगे। इसमें हवा की दिशा, गति, वातावरण में नमी, बादलों की स्थिति और अन्य मौसमी संकेतों को देखा जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, इन संकेतों के आधार पर जयपुर सहित आसपास के क्षेत्रों में आगामी दिनों में बारिश की संभावना और मानसून की सक्रियता को लेकर अनुमान जारी किया जाएगा।
प्राचीन विज्ञान और मौसम अध्ययन का संगम
जयपुर का जंतर-मंतर केवल एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान और मौसम अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र भी रहा है। यहां मौजूद विशाल खगोलीय यंत्रों का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने करवाया था। इन यंत्रों की मदद से उस समय ग्रहों, नक्षत्रों और प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन किया जाता था।
आषाढ़ी वायु धारणी पूर्णिमा पर होने वाला यह परीक्षण इसी वैज्ञानिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान का हिस्सा माना जाता है। हालांकि आधुनिक मौसम विज्ञान में बारिश का पूर्वानुमान उपग्रहों, रडार और वैज्ञानिक मॉडलों से लगाया जाता है, लेकिन पारंपरिक मौसम संकेतों का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व आज भी बना हुआ है।
मानसून की स्थिति पर रहेगी नजर
राजस्थान में इन दिनों मानसून सक्रिय है और कई जिलों में बारिश का दौर जारी है। ऐसे में जंतर-मंतर पर होने वाले इस वायु परीक्षण से लोगों की नजरें मानसून की आगामी स्थिति पर रहेंगी। जयपुर और आसपास के इलाकों में बारिश की संभावना को लेकर विशेषज्ञों के अनुमान का इंतजार किया जा रहा है।
आयोजन से जुड़े लोगों का कहना है कि यह केवल मौसम अनुमान की परंपरा नहीं, बल्कि राजस्थान की प्राचीन वैज्ञानिक सोच और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने का प्रयास भी है। हर साल इस आयोजन में इतिहास, ज्योतिष, खगोल विज्ञान और मौसम विज्ञान में रुचि रखने वाले लोग शामिल होते हैं।
