20 साल की कानूनी लड़ाई के बाद मिला भूखंड, अब राजस्थान आवासन मंडल ने 85 लाख से बढ़ाकर मांगे 1.65 करोड़ रुपए
राजस्थान आवासन मंडल के सेवानिवृत्त कर्मचारी धर्मेंद्र माथुर को कर्मचारी कोटे में भूखंड हासिल करने के लिए करीब दो दशक तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। तीन बार अदालत से राहत मिलने के बाद आखिरकार मई 2026 में उन्हें भूखंड आवंटित किया गया। लेकिन अब भूखंड की कीमत और दस्तावेजों में गड़बड़ी को लेकर मामला फिर उलझ गया है। आवासन मंडल ने पहले 85 लाख रुपए का मांग-पत्र जारी किया था, जिसे बाद में संशोधित कर करीब 1 करोड़ 65 लाख 35 हजार रुपए कर दिया गया।
धर्मेंद्र माथुर का दावा है कि संशोधित मांग-पत्र के जरिए उनसे करीब 86 लाख रुपए अतिरिक्त मांगे जा रहे हैं। उनका कहना है कि लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद भूखंड का आवंटन हुआ, लेकिन अब बढ़ी हुई राशि ने उनके सामने नई परेशानी खड़ी कर दी है।
पहले 85 लाख का मांग-पत्र, फिर बढ़ाकर 1.65 करोड़ किया
माथुर को मई 2026 में कर्मचारी कोटे के तहत भूखंड आवंटित हुआ था। इसके बाद आवासन मंडल की ओर से उन्हें 85 लाख रुपए का मांग-पत्र जारी किया गया। हालांकि, बाद में मंडल ने इस मांग-पत्र को संशोधित करते हुए करीब 1 करोड़ 65 लाख 35 हजार रुपए जमा कराने को कहा।
इस बदलाव के बाद भूखंड की कीमत में करीब 80 लाख रुपए से अधिक की बढ़ोतरी हो गई। माथुर का दावा है कि उनसे लगभग 86 लाख रुपए अतिरिक्त मांगे जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि पहले जारी मांग-पत्र और संशोधित मांग-पत्र में इतनी बड़ी राशि का अंतर किस आधार पर आया।
दस्तावेजों की गड़बड़ी से बढ़ी परेशानी
मामले में भूखंड की कीमत के साथ दस्तावेजों से जुड़ी गड़बड़ियों का मुद्दा भी सामने आया है। करीब दो दशक तक चले कानूनी संघर्ष के बाद आवंटन मिलने के बावजूद अब माथुर को भुगतान और दस्तावेजों को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
फिलहाल मामले में आवासन मंडल की ओर से राशि में बदलाव का विस्तृत आधार सामने आना बाकी है। यह भी स्पष्ट होना है कि संशोधित मांग-पत्र में अतिरिक्त राशि किस गणना और नियम के तहत जोड़ी गई। मंडल के स्पष्टीकरण के बाद ही पूरे विवाद की स्थिति साफ हो सकेगी।
