झोर गांव के किसान ने बदली खेती की तस्वीर, केसर और अश्वगंधा से लिखी सफलता की नई कहानी
राजस्थान के राजसमंद जिला के झोर गांव की धरती अब एक नई खुशबू से महक रही है। जहां कभी गेहूं, मक्का और चने जैसी पारंपरिक फसलें ही किसानों की पहचान हुआ करती थीं, वहीं अब यहां की खेती में बदलाव की नई बयार देखने को मिल रही है। इस बदलाव के केंद्र में हैं प्रगतिशील किसान रामलाल खारोल, जिन्होंने अपनी मेहनत, नवाचार और आधुनिक सोच से खेती की दिशा ही बदल दी है।
रामलाल खारोल ने परंपरागत खेती से हटकर केसर और अश्वगंधा जैसी बहुमूल्य औषधीय फसलों की खेती शुरू की और इसमें उल्लेखनीय सफलता हासिल की। उनकी इस पहल ने न केवल उनकी आय बढ़ाई है, बल्कि क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी एक प्रेरणा का काम किया है। खास बात यह है कि उन्होंने जिले में पहली बार अमेरिकन केसर (अडक केसर) और सिम पुष्टि अश्वगंधा की सफल पैदावार कर नई मिसाल कायम की है।
केसर, जिसे ‘लाल सोना’ भी कहा जाता है, आमतौर पर ठंडे क्षेत्रों में उगाई जाती है। लेकिन राजसमंद जैसे इलाके में इसकी सफल खेती करना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। आधुनिक तकनीक, उचित सिंचाई प्रबंधन और वैज्ञानिक तरीके अपनाकर रामलाल ने यह साबित कर दिया कि यदि सही जानकारी और संसाधनों का उपयोग किया जाए, तो किसी भी क्षेत्र में नई संभावनाएं पैदा की जा सकती हैं।
अश्वगंधा की खेती भी उनके लिए लाभकारी साबित हुई है। यह एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है, जिसकी बाजार में काफी मांग रहती है। कम लागत और बेहतर मुनाफे के कारण यह फसल किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प बनकर उभरी है। रामलाल ने इसके उत्पादन में भी गुणवत्ता और मात्रा दोनों पर विशेष ध्यान दिया, जिससे उन्हें अच्छा आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ।
रामलाल खारोल की इस सफलता ने झोर गांव सहित पूरे क्षेत्र के किसानों को नई दिशा दी है। अब कई किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ औषधीय और नकदी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञ भी इस तरह के नवाचार को प्रोत्साहित कर रहे हैं और किसानों को आधुनिक खेती के लिए जागरूक कर रहे हैं।
आज झोर गांव की पहचान केवल पारंपरिक खेती तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह नवाचार और प्रगतिशील सोच का उदाहरण बन चुका है। रामलाल खारोल की यह पहल न केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता की कहानी है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र के कृषि विकास की नई शुरुआत भी है।
