451 साल पुरानी परंपरा, वीडियो में जाने उदयपुर के मेनार गांव में खेली गई बारूद की होली, महायुद्ध जैसा दिखा नजारा
राजस्थान के उदयपुर जिले के मेनार गांव में बुधवार रात एक अनोखी और ऐतिहासिक परंपरा देखने को मिली। लाल पगड़ियों और सजे-धजे पारंपरिक परिधानों में ग्रामीण आधी रात को हाथों में तलवारें लिए खड़े थे। चारों ओर आग उगलती तोपें, बारूद के धमाके और बंदूकों की आवाजें गूंज रही थीं। माहौल ऐसा लग रहा था जैसे किसी युद्ध का दृश्य हो।
यह अनोखा नजारा उदयपुर से करीब 45 किलोमीटर दूर उदयपुर–चित्तौड़गढ़ नेशनल हाईवे पर स्थित मेनार गांव में देखने को मिला, जहां मेनारिया ब्राह्मण समाज ने 451 साल पुरानी परंपरा के तहत बारूद की होली खेली। यह आयोजन हर साल होलिका दहन के 48 घंटे बाद यानी तीसरी रात को किया जाता है।
इस परंपरा के पीछे एक ऐतिहासिक कथा जुड़ी हुई है। बताया जाता है कि करीब साढ़े चार सौ साल पहले मेनारिया ब्राह्मणों ने मुगल चौकी को ध्वस्त किया था। उस जीत की खुशी में गांव के लोगों ने बारूद के धमाकों के साथ जश्न मनाया था। तभी से इस जीत की याद में हर साल इसी तरह बारूद की होली खेलने की परंपरा निभाई जाती है।
बुधवार रात भी गांव में ठीक उसी अंदाज में यह आयोजन किया गया। गांव के चौक और गलियों में ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में एकत्र हुए। हाथों में तलवारें, मशालें और बारूद से भरी तोपों के साथ लोगों ने धमाके किए। बारूद की तेज आवाजें और आसमान में उठती चिंगारियां पूरे इलाके को रोशनी और धुएं से भर देती हैं।
इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि इसमें सिर्फ युवा ही नहीं बल्कि बुजुर्ग भी पूरे जोश के साथ हिस्सा लेते हैं। बुजुर्ग ग्रामीण युवाओं के साथ मिलकर तोपों से बारूद दागते हैं और परंपरा को जीवित रखने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। पूरे गांव में ढोल और दुंदुभि की गूंज सुनाई देती है, जिससे माहौल और भी उत्साहपूर्ण हो जाता है।
कार्यक्रम के दौरान ग्रामीण तलवारों के साथ प्रसिद्ध राजस्थानी पारंपरिक नृत्य “गैर” भी करते हैं। यह नृत्य मेवाड़ क्षेत्र की संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। गैर नृत्य के दौरान कलाकार तलवारों के साथ तालमेल बनाते हुए गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हैं, जो देखने में बेहद आकर्षक लगता है।
इसके साथ ही मशालें लेकर गांव के रास्तों की मोर्चाबंदी भी की जाती है। यह प्रतीकात्मक रूप से उस ऐतिहासिक युद्ध की याद दिलाता है, जब गांव के लोगों ने दुश्मनों का सामना किया था। मशालों की रोशनी और बारूद के धमाकों के बीच यह दृश्य किसी ऐतिहासिक फिल्म के युद्ध दृश्य जैसा प्रतीत होता है।
मेनार गांव की इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं। इस बार भी राजस्थान के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश से लोग इसे देखने आए। इतना ही नहीं, विदेशों से आए पर्यटक भी इस अनोखी परंपरा और मेवाड़ की संस्कृति को करीब से देखने के लिए मेनार पहुंचे।
स्थानीय लोगों के अनुसार यह सिर्फ एक उत्सव नहीं बल्कि इतिहास, वीरता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। पीढ़ी दर पीढ़ी इस परंपरा को पूरे उत्साह और गर्व के साथ निभाया जा रहा है। यही कारण है कि मेनार गांव की बारूद की होली आज पूरे देश में अपनी अनोखी पहचान बना चुकी है।
