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Jaipur राजस्थान में शुरू हुआ मुफ्त स्मार्टफोन योजना का तौल, केजरीवाल से मिले सत्ताधारी पार्टी के नेता, विधायक के सपने में आए जयचंद
 

जयपुर न्यूज़ डेस्क, सत्तारूढ़ दल के नेताओं को उदारवादी माना जाता है और वे अन्य दलों के नेताओं के साथ बैठकें करते हैं। हाल ही में नेताजी की दिल्ली में सत्तारूढ़ दल के साथ बैठक राजधानी में एक गर्म विषय है। सत्ताधारी दल में दो पदों पर आसीन नेताजी ने राष्ट्रीय राजधानी में गुपचुप तरीके से सीएम अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की। क्या एक नेता जो वित्त प्रबंधन में निपुण है, उसे केवल शिष्टाचार से नहीं पाया जा सकता है? ऐसे में अब कई नेता इस बैठक का मकसद डिकोड करने में लगे हैं।

कल तक शेखी बघारने वाले नेताओं का लहजा बदला

ड्रग्स की तरह कमिटमेंट, स्टैंड जैसे शब्दों की भी राजनीति में एक्सपायरी डेट होती है। जब किसी नेता के सत्ता में आने की थोड़ी सी भी संभावना होती है, तो आलोचक भी चुप हो जाते हैं और रंग बदलने लगते हैं। सत्ताधारी दल में भी युवा नेता की आलोचना करने वाले विधायकों के तेवर रातोंरात बदल गए हैं। एक विधायक ने तो पूरा यू-टर्न भी लिया और शुरू में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

युवा नेता को पानी पिलाकर श्राप देने वाले विधायक अब पुराने संबंधों से तांडव कर रहे हैं। एक हफ्ते पहले एक बैठक में लोगों को धमकी देकर युवा नेता की नारेबाजी रोकने वाले विधायक ने अब खुद को युवा नेता के पिता का कार्यकर्ता बताया है. जानकारों का अनुमान है कि बहस के कारण ही यह स्थिति पैदा हुई है। वैसे राजनीतिक मौसम विज्ञानी माने जाने वाले नेताओं का फंडा साफ है कि जहां ताकत है वहां हम हैं।

राहुल से लेकर साईं दरबार तक, सरकारी-संस्थाओं के मुखियाओं के साथ राज
अब जब प्रदेश अध्यक्ष ने पार्टी के सबसे पुराने अध्यक्ष का चुनाव लड़ने का फैसला किया है तो सियासी पारा अचानक चढ़ना शुरू हो गया है। कई नाम सरकार के प्रमुख के स्वाभाविक दावेदार के रूप में लूटे गए हैं।

राहुल गांधी की आखिरी हां-ना सुनने गए सरकार के मुखिया संगठन के मुखिया को अपने साथ ले गए। साईं के दरबार की यात्रा से लेकर जिस तरह से संस्था के मुखिया को प्राथमिकता दी गई, उसके राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। कहा जाता है कि यह संबंध अकारण नहीं है, इसका रहस्य जल्द ही सुलझ जाएगा। संगठन के प्रमुख को ऊपर उठाना एक काउंटर रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

विधायक के सपने में आए जयचंद

जयचंद पिछले कुछ समय से कांग्रेस की राजनीति में चर्चा का विषय बने हुए हैं। इस महीने की शुरुआत में ट्रेंड करने लगे इस शब्द ने सत्तारूढ़ दल की राजनीति में हलचल मचा दी। कार्यकाल की शुरुआत सत्ता विरोधी खेमे के एक विधायक से हुई थी, जिसे लेकर एक मंत्री तक पलटवार हो गया था।

जयचंद को लेकर विधानसभा में सत्तारूढ़ दल के विधायकों के बीच काफी चर्चा हुई। इस बात से आहत विधायक ने अपना दुख साझा किया और अपने साथी विधायकों से कहा कि वे राज्य के मुखिया की बैठक के बाद से केवल जयचंद का सपना देख रहे थे।
बड़े नेता ने नहीं उठाया फोन, आलाकमान से की शिकायत

सत्ता में बैठे बड़े-बड़े नेताओं से ज्यादा उनके सहयोगी बर्बादी करते हैं। सत्ता के बड़े घर के एक सहयोगी ने बड़े नेता का फोन नहीं उठाया। बड़े नेताजी का आलाकमान से सीधा संपर्क है, बार-बार कॉल का जवाब नहीं मिलने पर बड़े नेताजी ने आलाकमान से शिकायत की।

वो भी खत्म हो गया। वैसे पावर सेंटर में फोन न उठाने की शिकायत कोई नई नहीं है। बड़े नेताजी के बेटे ने भी सार्वजनिक रूप से अपना दुख व्यक्त किया। इतने दिनों तक तो हालात ठीक थे लेकिन इस बार एक मिस्ड कॉल तकलीफदेह साबित हो सकती है।

मुफ्त स्मार्टफोन योजना के फायदे और नुकसान का मूल्यांकन शुरू हुआ

महिलाओं को मुफ्त स्मार्ट फोन वितरित करने की सरकार की योजना में कुछ समय लगने की संभावना है। 12 हजार करोड़ की इस योजना के राजनीतिक पक्ष-विपक्ष का आकलन किया जा रहा है। सत्ताधारी दल के कुछ नेता चुपके से योजना के हर पहलू का लेखा-जोखा रखने में व्यस्त हैं।

कुछ नेताओं का तर्क है कि पूर्वी नहर परियोजना का एक तिहाई 12,000 करोड़ रुपये में पूरा किया जा सकता है। जानकारों का कहना है कि अगर इस योजना को जल्द धरातल पर नहीं उतारा गया तो भविष्य में इसे संकट का सामना करना पड़ सकता है। सरकार के आने वाले प्रमुख को इसे जारी रखने में दिलचस्पी नहीं है। इसके बड़े पैमाने पर होने वाले खर्च के फायदे-नुकसान की तौल शुरू हो गई है।