दशहरा पर राजस्थान की 5 अनोखी परंपराएं: कहीं रावण पीता है 20 फीट लंबी बीड़ी, कहीं कुश्ती लड़कर पैरों से कुचलते हैं लोग
राजस्थान में दशहरा सिर्फ रावण दहन तक सीमित नहीं है। यहां कई शहरों और समुदायों में ऐसी परंपराएं निभाई जाती हैं, जो देश के दूसरे हिस्सों से बिल्कुल अलग हैं। कहीं रावण के पुतले को जलाने के बजाय मिट्टी के रावण को पैरों से कुचला जाता है, तो कहीं रावण के दहन के बाद शोक सभा और अस्थि विसर्जन जैसी रस्में निभाई जाती हैं। आइए जानते हैं राजस्थान की दशहरे से जुड़ी पांच अनोखी परंपराओं के बारे में।
1. कोटा में रावण को पैरों से कुचलते हैं पहलवान
कोटा के नांता और किशोरपुरा इलाके में जेठी समाज की अनूठी परंपरा देखने को मिलती है। यहां दशहरे पर मिट्टी से रावण की आकृति बनाई जाती है। इसके बाद अखाड़े के पहलवान उससे प्रतीकात्मक कुश्ती लड़ते हैं और फिर उसे पैरों से रौंदकर नष्ट कर देते हैं।
इस परंपरा को करीब 150 से 200 साल पुराना बताया जाता है। मान्यता है कि हाड़ा राजाओं को कुश्ती का शौक था और उन्होंने गुजरात से पहलवानों को बुलाकर यहां बसाया था। आज भी जेठी समाज के लोग इस परंपरा को अपनी सांस्कृतिक विरासत के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं।
2. जयपुर में रावण दहन के बाद होती है शोक सभा
जयपुर के प्रताप नगर और सांगानेर क्षेत्र में रावण दहन से जुड़ी एक अलग परंपरा निभाई जाती है। यहां रावण का पुतला जलाने के बाद उसकी मृत्यु पर शोक सभा आयोजित की जाती है। इसे कई जगह ‘तीये की बैठक’ की तरह मनाया जाता है।
इस परंपरा में अगले दिन प्रतीकात्मक रूप से रावण की राख यानी अस्थियां एकत्र की जाती हैं। इसके बाद पगड़ी की रस्म और ब्रह्मभोज जैसी परंपराएं भी निभाई जाती हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इन रस्मों के जरिए रावण की अंतिम क्रियाएं पूरी की जाती हैं।
3. जोधपुर में रावण दहन पर कुछ लोग मनाते हैं शोक
जोधपुर में रावण को लेकर एक अलग धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यता प्रचलित है। श्रीमाली गोधा ब्राह्मण समाज के कुछ लोग खुद को रावण का वंशज मानते हैं और जोधपुर को रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका बताते हैं।
इसी मान्यता के चलते समाज के कुछ लोग दशहरे पर रावण दहन देखने से बचते हैं और शोक मनाते हैं। रावण दहन का धुआं देखने के बाद स्नान करने और जनेऊ बदलने जैसी परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है। यह स्थानीय समुदाय की मान्यताओं से जुड़ी परंपरा है।
4. जयपुर में मुस्लिम परिवार बनाता है रावण का विशाल पुतला
जयपुर के आदर्श नगर में रावण का विशाल पुतला बनाने की जिम्मेदारी मथुरा का एक मुस्लिम परिवार कई पीढ़ियों से निभाता आ रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, यह परिवार पांच पीढ़ियों से इस काम से जुड़ा है।
पुतला बनाने के दौरान कारीगर विशेष नियमों और संयम का पालन करते हैं। इस काम में बांस, कागज, रस्सी और अन्य सामग्री का इस्तेमाल होता है। यह परंपरा धार्मिक आयोजन में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी और आपसी सहयोग की मिसाल के रूप में देखी जाती है।
5. झुंझुनूं के उदयपुरवाटी में रावण के पुतले पर होती है फायरिंग
राजस्थान के झुंझुनूं जिले के उदयपुरवाटी कस्बे में भी दशहरे से जुड़ी अनोखी परंपरा का जिक्र मिलता है। यहां रावण दहन से पहले उसके पुतले पर गोलियां चलाने की परंपरा रही है। मीडिया रिपोर्टों में इसे करीब 400 साल पुरानी परंपरा बताया गया है।
हालांकि, इस परंपरा के आयोजन और मौजूदा वर्ष में इसके पालन की स्थिति की पुष्टि अलग से जरूरी है। इसका उल्लेख राजस्थान की उन स्थानीय परंपराओं में किया जाता है, जिनमें विजयादशमी का उत्सव सामान्य रावण दहन से अलग तरीके से मनाया जाता है।
20 फीट लंबी बीड़ी वाली परंपरा का क्या है मामला?
रावण को 20 फीट लंबी बीड़ी पिलाने की परंपरा का जिक्र भी इस खबर के शीर्षक में है, लेकिन उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों से इसके स्थान और आयोजन की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी। इसलिए इसे किसी खास शहर या समुदाय से जोड़कर निश्चित तथ्य के रूप में बताना उचित नहीं होगा।
राजस्थान की ये परंपराएं बताती हैं कि दशहरा अलग-अलग इलाकों में स्थानीय इतिहास, लोक मान्यताओं और सामुदायिक संस्कृति के अनुसार अलग रूप लेता है। कहीं रावण का दहन होता है, कहीं उसे पैरों से कुचला जाता है और कहीं उससे जुड़ी अंतिम संस्कार जैसी रस्में निभाई जाती हैं।
