राजस्थान में MBBS की 1,039 सीटें खाली, NEET काउंसलिंग नियमों पर विवाद; वीडियो में जाने दूसरे राज्यों के छात्रों को आरक्षण का लाभ नहीं
राजस्थान में MBBS की सीटों पर दाखिले को लेकर NEET काउंसलिंग के नियमों में बदलाव ने विवाद खड़ा कर दिया है। प्रदेश के 15 निजी मेडिकल कॉलेजों में MBBS की 1,039 सीटें खाली रह जाने का मामला चर्चा में है। निजी मेडिकल कॉलेज इन खाली सीटों के लिए काउंसलिंग के बदले हुए नियमों को जिम्मेदार बता रहे हैं। वहीं, राजस्थान काउंसलिंग बोर्ड का कहना है कि दाखिले की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और राज्य की आरक्षण नीति के अनुरूप अपनाई गई है।
एक तरफ मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए हजारों विद्यार्थी प्रयास कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने से निजी कॉलेजों और काउंसलिंग बोर्ड के बीच मतभेद सामने आए हैं। विवाद का मुख्य मुद्दा तीसरे राउंड की काउंसलिंग में दूसरे राज्यों के अभ्यर्थियों को मिलने वाले आरक्षण लाभ से जुड़ा है।
इस साल क्या बदला काउंसलिंग का नियम?
राजस्थान में पहले तीसरे राउंड की काउंसलिंग के दौरान जब राज्य के मूल निवासी अभ्यर्थियों की मेरिट सूची में उपलब्ध उम्मीदवार समाप्त हो जाते थे, तो खाली बची सीटों पर दूसरे राज्यों के विद्यार्थियों को भी मौका दिया जाता था। इन अभ्यर्थियों को संबंधित नियमों के तहत केंद्रीय आरक्षण और छूट का लाभ मिल सकता था। इस व्यवस्था के तहत दूसरे राज्यों के योग्य उम्मीदवार भी खाली सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते थे। निजी मेडिकल कॉलेजों का कहना है कि इससे दाखिले की प्रक्रिया के अंत तक सीटें भरने में मदद मिलती थी।लेकिन शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए राजस्थान काउंसलिंग बोर्ड ने सूचना बुलेटिन के क्लॉज XI में बदलाव किया है। नए नियम के मुताबिक, तीसरे राउंड में दूसरे राज्यों के विद्यार्थियों को केंद्रीय आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
दूसरे राज्यों के छात्रों को कैसे मिलेगा प्रवेश?
नए प्रावधान के अनुसार, दूसरे राज्यों के अभ्यर्थी तभी बची हुई सीटों के लिए पात्र हो सकेंगे, जब राजस्थान के मूल निवासी अभ्यर्थियों की मेरिट सूची समाप्त हो जाएगी। इसके बाद भी उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा और सीट के लिए सामान्य यानी अनारक्षित वर्ग की कटऑफ के आधार पर पात्रता पूरी करनी होगी।
इस बदलाव का असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ सकता है, जो दूसरे राज्यों से राजस्थान के निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश लेना चाहते हैं और पहले केंद्रीय आरक्षण या संबंधित छूट के आधार पर सीट पाने की उम्मीद रखते थे।हालांकि, प्रवेश केवल नियमों के अनुसार पात्रता, मेरिट और उपलब्ध सीटों के आधार पर ही दिया जा सकता है। किसी अभ्यर्थी को सीट मिलना उसकी योग्यता और संबंधित कटऑफ पर निर्भर करेगा।
निजी मेडिकल कॉलेज क्यों उठा रहे सवाल?
राजस्थान के 15 निजी मेडिकल कॉलेजों में 1,039 MBBS सीटें खाली रहने के बाद कॉलेज संचालकों ने काउंसलिंग व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि दूसरे राज्यों के अभ्यर्थियों के लिए आरक्षण संबंधी नियमों में बदलाव से खाली सीटों को भरने के विकल्प सीमित हो गए हैं।निजी कॉलेजों का मानना है कि जब राज्य के योग्य अभ्यर्थी उपलब्ध नहीं होते, तब दूसरे राज्यों के उम्मीदवारों को पहले की तरह अवसर मिलना चाहिए। उनके अनुसार, इससे सीटें खाली रहने की समस्या कम हो सकती है।दूसरी ओर, काउंसलिंग बोर्ड का पक्ष है कि पूरी प्रक्रिया लागू नियमों, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और राज्य की आरक्षण नीति के अनुरूप की गई है। ऐसे में विवाद का समाधान संबंधित कानूनी प्रावधानों और काउंसलिंग नियमों की व्याख्या पर निर्भर करेगा।
खाली सीटों से आगे क्या होगा?
MBBS की 1,039 सीटें खाली रहने का मामला मेडिकल शिक्षा और निजी कॉलेजों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। खाली सीटों का असर कॉलेजों की आय और उपलब्ध मेडिकल शिक्षा क्षमता पर पड़ सकता है। वहीं, इच्छुक अभ्यर्थियों के लिए यह जानना जरूरी है कि आगे किसी अतिरिक्त राउंड या सीट भरने की प्रक्रिया को लेकर क्या निर्णय लिया जाता है।फिलहाल मुख्य सवाल यही है कि क्या काउंसलिंग नियमों में बदलाव के बावजूद खाली सीटें भरने का कोई रास्ता निकलेगा या मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी। इसका जवाब काउंसलिंग बोर्ड के अगले निर्णय, लागू नियमों और जरूरत पड़ने पर होने वाली कानूनी कार्रवाई से स्पष्ट होगा।
