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डूंगरपुर सभापति चुनाव में सुशीला गुप्ता को भाजपा का टिकट: प्रभु पंड्या निर्दलीय प्रत्याशी बने, बहुमत के बावजूद बढ़ी खींचतान

 
डूंगरपुर सभापति चुनाव में सुशीला गुप्ता को भाजपा का टिकट: प्रभु पंड्या निर्दलीय प्रत्याशी बने, बहुमत के बावजूद बढ़ी खींचतान

डूंगरपुर नगर परिषद में सभापति चुनाव को लेकर भाजपा के अंदर चल रही खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है। 40 वार्डों वाली नगर परिषद में भाजपा ने 24 सीटों पर जीत हासिल कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया है, लेकिन सभापति पद के लिए पार्टी के दो दावेदारों के नामांकन से मुकाबला दिलचस्प हो गया। भाजपा ने सुशीला गुप्ता को अपना अधिकृत प्रत्याशी बनाया है, जबकि पूर्व जिलाध्यक्ष और प्रदेश कार्यसमिति सदस्य प्रभु पंड्या ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है।

सुशीला गुप्ता को भाजपा का सिंबल

सभापति पद सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित है। इस पद के लिए भाजपा में सुशीला गुप्ता और प्रभु पंड्या के नाम प्रमुख रूप से सामने आए थे। नामांकन के दौरान दोनों ने अपनी-अपनी दावेदारी पेश की थी। इसके बाद पार्टी ने सुशीला गुप्ता को अधिकृत प्रत्याशी के रूप में सिंबल दिया।

सुशीला गुप्ता पूर्व सभापति केके गुप्ता की पत्नी हैं। उन्होंने सभापति पद के लिए भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल किया है। अब पार्टी की ओर से उन्हें अपने बहुमत वाले बोर्ड के सभी पार्षदों का समर्थन दिलाने की कोशिश की जाएगी।

प्रभु पंड्या ने निर्दलीय भरा पर्चा

दूसरी ओर प्रभु पंड्या ने पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल कर दिया है। पंड्या भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष रह चुके हैं और पार्टी के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य भी हैं। उनके मैदान में रहने से भाजपा के सामने अपने ही खेमे के बीच मुकाबला हो गया है।

नामांकन के दौरान दोनों दावेदारों के समर्थक पार्षदों की मौजूदगी ने भी पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को सामने ला दिया। दोनों पक्षों की ओर से अपने समर्थन में पार्षद होने का दावा किया जा रहा था।

24 पार्षदों के साथ भाजपा के पास बहुमत

डूंगरपुर नगर परिषद के 40 वार्डों में भाजपा ने 24 सीटें जीती हैं। इस तरह पार्टी के पास सभापति चुनाव के लिए पर्याप्त संख्या बल है। इसके बावजूद पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के सामने भाजपा के ही वरिष्ठ नेता के निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरने से चुनावी गणित पर सबकी नजर है।

नामांकन के बाद अब पार्टी नेतृत्व के सामने बागी प्रत्याशी को मनाने की चुनौती भी है। यदि प्रभु पंड्या मैदान में बने रहते हैं तो भाजपा के पार्षदों को एकजुट रखना पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगा। वहीं, निर्दलीय पार्षदों का रुख भी चुनाव के दौरान अहम हो सकता है।

कांग्रेस ने भी दाखिल किया नामांकन

सभापति पद के लिए कांग्रेस की ओर से भी उम्मीदवार ने नामांकन दाखिल किया है। ऐसे में डूंगरपुर में मुकाबला केवल भाजपा के भीतर की खींचतान तक सीमित नहीं है। हालांकि भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत होने के कारण उसके अधिकृत प्रत्याशी की स्थिति संख्या बल के लिहाज से मजबूत है।

अब निगाहें नाम वापसी की प्रक्रिया और अंतिम प्रत्याशियों पर टिकी हैं। यदि प्रभु पंड्या अपना नामांकन वापस नहीं लेते हैं तो भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी और उनके बीच चुनावी मुकाबला होगा। ऐसे में बहुमत होने के बावजूद भाजपा को अपने पार्षदों को एकजुट रखने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

डूंगरपुर नगर परिषद में सभापति चुनाव के नतीजे यह भी तय करेंगे कि भाजपा अपने 24 पार्षदों के बहुमत को किस तरह एकजुट रख पाती है और पार्टी के भीतर सामने आई दावेदारी का चुनाव पर कितना असर पड़ता है।