Aapka Rajasthan

Chittorgarh मीराबाई के कारण ही चित्तौड़गढ़ बन सका ‘शक्ति’ के साथ ‘भक्ति’ की नगरी

 
Chittorgarh मीराबाई के कारण ही चित्तौड़गढ़ बन सका ‘शक्ति’ के साथ ‘भक्ति’ की नगरी

चित्तौड़गढ़ न्यूज़ डेस्क, शक्ति एवं भक्ति की नगरी कहे जाने वाले चित्तौड़गढ़ को शक्ति की उपाधि यहां के वीरों की वीरता से मिली लेकिन, भक्ति की नगरी का खिताब मीराबाई की अनन्य भक्ति से मिला है। चित्तौडग़ढ़ को शक्ति और भक्ति की अलग पहचान मीराबाई की ही देन है। इस साल यहां दुर्ग पर मीराबाई का 525वां जन्मोत्सव समारोह पूर्वक मनाया जाएगा।

इसके तहत 21 से 23 दिसबर तक विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। जिला प्रशासन इसकी तैयारियों में जुटा है। मीराबाई का जन्म सन 1498 में पाली के मेड़ता स्थित कुडक़ी में रतन सिंह के घर हुआ। ये बचपन से ही कृष्णभक्ति में रुचि लेने लगी थीं। मीरा का विवाह मेवाड़ के सिसोदिया राज परिवार में हुआ। भोजराज इनके पति थे जो महाराणा सांगा के पुत्र थे। विवाह के कुछ समय बाद ही पति का देहान्त हो गया। पति की मृत्यु के बाद उन्हें पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया किन्तु, मीरा इसके लिए तैयार नहीं हुईं।

विरक्ति हुई और हरि कीर्तन में रम गईं

पति की मृत्यु के बाद इनकी भक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। ये मंदिरों में जाकर वहां मौजूद कृष्ण भक्तों की मौजूदगी में कृष्ण की मूर्ति के आगे नृत्य किया करती थीं। मीराबाई का कृष्ण भक्ति में नृत्य एवं गायन राज परिवार को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कई बार मीराबाई की हत्या की कोशिश की। परिजन के इस व्यवहार से परेशान हो वे पहले वृन्दावन एवं बाद में वहां से द्वारका चली गई। जहां पर उनका अंतिम समय बीता। वह जहां जाती थी, वहां लोगों का समान मिलता था। अपनी भक्ति के बल पर मीराबाई रहस्यवाद और भक्ति की निर्गुण मिश्रित सगुण पद्धति सर्वमान्य बनी।

दुर्ग पर है मीरा का मंदिर

यहां दुर्ग पर कुंभश्याम मंदिर में ही मीरा बाई का मंदिर बना हुआ है। यहां पर आने वाले पर्यटकों के लिए विजय स्तंभ एवं पद्मिनी महल के साथ ही मीरा मंदिर भी विशेष आकर्षण का केन्द्र रहता है। यहां पर पर्यटकों का ठहराव भी काफी देर तक होता है।पर्यटक यहां पर आने के साथ ही मीरा बाई के इतिहास की भी विस्तार से जानकारी लेते है। चित्तौड़ दुर्ग पर मीरा की स्मृतियां दिलाने वाली कई विरासत है जो पर्यटकों का आर्कषण का केंद्र भी है।