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सरपंच का चुनाव हारने के बाद भी परिवार को मिला पूरे गांव का साथ, ग्रामीणों ने जुटाए 7 लाख रुपये; बीकानेर की अनूठी पहल चर्चा में

 
सरपंच का चुनाव हारने के बाद भी परिवार को मिला पूरे गांव का साथ, ग्रामीणों ने जुटाए 7 लाख रुपये; बीकानेर की अनूठी पहल चर्चा में

राजनीति में अक्सर चुनाव जीतने वाले प्रत्याशियों के घर जश्न मनाया जाता है, जबकि हारने वाले प्रत्याशियों को निराशा का सामना करना पड़ता है। कई बार चुनाव में खर्च के कारण परिवारों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ जाता है। लेकिन राजस्थान के बीकानेर जिले में एक हारे हुए सरपंच प्रत्याशी के परिवार के साथ गांव के लोगों ने ऐसा अपनापन दिखाया कि हर तरफ उनकी पहल की चर्चा होने लगी।

बीकानेर की ग्राम पंचायत गुसाईसर के गांव रुणिया बड़ा बास में सरपंच चुनाव हारने वाले पुरखाराम नायक की मदद के लिए ग्रामीण एकजुट हो गए। चुनाव में हार के बाद उनकी आर्थिक स्थिति को देखते हुए गांव के लोगों ने आपसी सहयोग से 7 लाख रुपये जुटाए और उन्हें सम्मान के साथ सौंपे।

95 वोटों से हार गए थे पुरखाराम नायक

जानकारी के अनुसार, पुरखाराम नायक ने सरपंच पद के लिए चुनाव लड़ा था। चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और वह महज 95 वोटों के अंतर से पीछे रह गए। चुनाव के दौरान प्रत्याशियों को प्रचार, जनसंपर्क और अन्य व्यवस्थाओं पर खर्च करना पड़ता है। पुरखाराम के परिवार पर भी चुनाव के बाद आर्थिक दबाव बढ़ गया था।ऐसे में गांव के लोगों ने उन्हें अकेला छोड़ने के बजाय मदद करने का फैसला किया। ग्रामीणों ने मिलकर राशि जुटाई, ताकि चुनाव में हार के बाद परिवार को आर्थिक परेशानियों से उबरने में सहारा मिल सके।

ग्रामीणों ने जुटाए 7 लाख रुपये

गांव के लोगों ने आपसी सहयोग से 7 लाख रुपये एकत्र किए। इसके बाद ग्रामीणों ने पुरखाराम नायक को सम्मानपूर्वक यह राशि सौंपी। इस दौरान उन्हें नोटों की माला पहनाकर सम्मानित भी किया गया।ग्रामीणों की इस पहल ने यह संदेश दिया कि चुनाव में जीत और हार अपनी जगह है, लेकिन आपसी संबंध और सामाजिक जिम्मेदारी उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। गांव के लोगों ने यह भी जताया कि चुनाव का परिणाम किसी व्यक्ति के प्रति उनके सम्मान और अपनत्व को कम नहीं कर सकता।

चुनावी हार के बीच मिला भावनात्मक सहारा

चुनाव हारने के बाद किसी भी प्रत्याशी के लिए निराश होना स्वाभाविक है। खासकर तब, जब चुनाव में समय और धन दोनों खर्च हुए हों। ऐसे समय में गांव के लोगों का साथ मिलना परिवार के लिए बड़ा सहारा बन सकता है।पुरखाराम नायक के मामले में ग्रामीणों ने केवल आर्थिक मदद ही नहीं की, बल्कि यह भरोसा भी दिया कि वह मुश्किल समय में अकेले नहीं हैं। गांव की इस पहल को सामाजिक एकजुटता और आपसी भाईचारे की मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है।

जीत-हार से ऊपर है गांव का भाईचारा

इस घटना से एक बार फिर यह बात सामने आई है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक रिश्तों की अहमियत चुनावी राजनीति से आगे भी बनी रह सकती है। चुनाव में कोई प्रत्याशी जीतता है तो कोई हारता है, लेकिन गांव का आपसी सहयोग और सम्मान कायम रहना जरूरी है।बीकानेर की यह पहल बताती है कि लोकतंत्र में चुनावी नतीजे महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन समाज की असली ताकत मुश्किल समय में एक-दूसरे के साथ खड़े होने में है।