8 साल की उम्र में शुरू की कुश्ती, आज बेटियों की ताकत बनी मिसाल; पिता ने कभी नहीं समझा बेटियों को बेटों से कम
छोटी उम्र में शुरू हुआ एक सफर आज हौसले और कामयाबी की कहानी बन चुका है। जब वह महज 8 साल की थीं, तब उनके पिता ने उन्हें रेसलिंग सीखने के लिए कोच के पास भेज दिया। उस समय कुश्ती के अखाड़े में ज्यादातर लड़के ही नजर आते थे, लेकिन पिता को अपनी बेटी की क्षमता पर पूरा भरोसा था।
उन्होंने बताया कि शुरुआत में कोच लड़कों के साथ ही रेसलिंग करवाते थे। धीरे-धीरे जब उन्होंने लड़कों को हराना शुरू किया तो उनका आत्मविश्वास बढ़ने लगा। पहले जो मुकाबले चुनौती लगते थे, वही बाद में उनकी ताकत बन गए। लड़कों के साथ कुश्ती लड़ते-लड़ते उनमें जीत का भरोसा और आगे बढ़ने का जज्बा पैदा हुआ।
वह कहती हैं कि परिवार से मिला समर्थन उनकी सबसे बड़ी ताकत रहा। उनके पिता ने कभी चारों बेटियों में किसी को भी लड़कों से कम नहीं समझा। परिवार में चार बहनें हैं, जिनमें से तीन ने रेसलिंग को अपना करियर बनाया है। पिता ने बेटियों को भी वही अवसर दिए, जो आमतौर पर बेटों को दिए जाते हैं।
कुश्ती जैसे खेल में बेटियों की भागीदारी को लेकर समाज में कई बार सवाल उठते हैं, लेकिन उनके पिता ने इन बातों की परवाह नहीं की। उन्होंने बेटियों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और खेल के मैदान में अपनी पहचान बनाने का मौका दिया।
रेसलिंग की शुरुआत से लेकर आज तक का सफर आसान नहीं रहा। मेहनत, अनुशासन और लगातार अभ्यास के दम पर उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। अखाड़े में लड़कों के साथ मुकाबला करने से मिला आत्मविश्वास आज उनकी सफलता की सबसे बड़ी वजहों में से एक है।
उनकी कहानी उन परिवारों के लिए प्रेरणा है, जो बेटियों के सपनों को सीमित कर देते हैं। उनका मानना है कि अगर बेटियों को सही मौका और परिवार का साथ मिले तो वे किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकती हैं।
एक पिता के विश्वास और बेटी की मेहनत ने साबित कर दिया कि प्रतिभा को पहचान और अवसर मिले तो बेटियां भी हर मैदान में अपना परचम लहरा सकती हैं।
