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पारंपरिक खेती छोड़ सब्जी उत्पादन अपनाया, भीलवाड़ा के किसान राहुल सोल बने आत्मनिर्भरता की मिसाल

 
पारंपरिक खेती छोड़ सब्जी उत्पादन अपनाया, भीलवाड़ा के किसान राहुल सोल बने आत्मनिर्भरता की मिसाल

गेहूं, मक्का और उड़द जैसी पारंपरिक फसलों की खेती में दिन-रात मेहनत करने के बावजूद भीलवाड़ा जिले के भगवानपुरा गांव के युवा किसान राहुल सोल को कभी स्थायी आमदनी नहीं मिल पा रही थी। कभी बारिश की मार तो कभी बाजार में भाव गिरने के कारण लागत तक निकालना मुश्किल हो जाता था। हालात ऐसे थे कि बमुश्किल घर का खर्च चल पाता और भविष्य को लेकर चिंता बनी रहती थी।

राहुल सोल बताते हैं कि पारंपरिक फसलों पर पूरी तरह निर्भर रहना अब घाटे का सौदा बन चुका था। मौसम की अनिश्चितता और बाजार के उतार-चढ़ाव ने किसानों की कमर तोड़ दी थी। कई बार कर्ज लेकर खेती करनी पड़ी, लेकिन उम्मीद के मुताबिक मुनाफा नहीं हुआ। ऐसे में उन्होंने खेती के तरीके को बदलने का फैसला किया और कुछ नया करने की ठानी।

युवा किसान राहुल ने कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेकर सब्जी उत्पादन की ओर कदम बढ़ाया। शुरुआत में उन्होंने छोटे स्तर पर सब्जियों की खेती शुरू की। आधुनिक तकनीक, उन्नत बीज और ड्रिप सिंचाई जैसी विधियों को अपनाया। इसके साथ ही उन्होंने फसल चक्र में बदलाव कर मौसम के अनुसार सब्जियों का चयन किया, जिससे उत्पादन बेहतर हो सके।

धीरे-धीरे राहुल की मेहनत रंग लाने लगी। सब्जियों की खेती से उन्हें पारंपरिक फसलों की तुलना में कई गुना अधिक आमदनी होने लगी। जहां पहले सालभर की मेहनत के बाद भी आमदनी सीमित रहती थी, वहीं अब नियमित रूप से बाजार में सब्जियां बेचकर अच्छी कमाई हो रही है। इससे न सिर्फ उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई, बल्कि परिवार का जीवन स्तर भी सुधरा है।

राहुल सोल का कहना है कि सब्जी उत्पादन में लागत जरूर ज्यादा होती है, लेकिन सही योजना और मेहनत से मुनाफा भी कहीं अधिक मिलता है। उन्होंने स्थानीय मंडियों के साथ-साथ सीधे ग्राहकों तक सब्जियां पहुंचाने के विकल्प भी तलाशे, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई और किसानों को बेहतर दाम मिले।

आज राहुल सोल क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। कई किसान उनके खेतों का दौरा कर रहे हैं और सब्जी उत्पादन की तकनीक सीख रहे हैं। राहुल का मानना है कि यदि किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ आधुनिक और नकदी फसलों की ओर ध्यान दें, तो खेती फिर से फायदे का सौदा बन सकती है।

उनकी सफलता यह साबित करती है कि सही सोच, मेहनत और तकनीक के सहारे खेती में भी आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है। भीलवाड़ा के इस युवा किसान की कहानी आज कई किसानों को नई राह दिखा रही है।