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बांसवाड़ा के सज्जनगढ़ क्षेत्र में यूरिया की कमी, किसान खाद संकट से जूझ रहे

 
बांसवाड़ा के सज्जनगढ़ क्षेत्र में यूरिया की कमी, किसान खाद संकट से जूझ रहे

राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के सज्जनगढ़ क्षेत्र के किसानों को इस बार खाद संकट का सामना करना पड़ रहा है। खरीफ और रबी दोनों फसलों की बुवाई के लिए हर साल किसानों को लगभग 20 हजार बोरी यूरिया की आवश्यकता होती है। लेकिन बीते छह महीनों में सज्जनगढ़ सहकारी समिति को मात्र 1700 बोरी ही उपलब्ध कराई गई। इस भारी कमी के कारण किसान अपनी आवश्यकतानुसार यूरिया नहीं जुटा पा रहे हैं और गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं।

स्थानीय किसानों ने बताया कि यूरिया की कमी के कारण उन्हें खुले बाजार और कालाबाजारी में यूरिया खरीदने को मजबूर होना पड़ रहा है। वर्तमान में यूरिया की दर 400 से 500 रुपए प्रति बोरी तक पहुँच गई है, जो उनके लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन गया है। किसानों का कहना है कि इस स्थिति ने खेती के खर्च को बढ़ा दिया है और फसल की गुणवत्ता और उत्पादन पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

किसानों का यह भी कहना है कि सहकारी समिति और स्थानीय प्रशासन को कई बार इस कमी की शिकायत की गई, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है। उन्होंने आशंका जताई है कि यदि जल्द ही यूरिया की आपूर्ति नियमित नहीं हुई, तो फसलों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और क्षेत्र में कृषि उत्पादन में कमी आ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यूरिया की यह कमी केवल स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि कृषि की स्थिरता और किसानों की आय पर सीधे असर डालती है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार और संबंधित विभाग खाद आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करें और समय पर किसानों को आवश्यक मात्रा में यूरिया उपलब्ध कराएं। इससे न केवल फसल उत्पादन बढ़ेगा बल्कि किसानों को आर्थिक सुरक्षा भी मिलेगी।

स्थानीय कृषि अधिकारीयों का कहना है कि यूरिया की कमी का कारण सप्लाई में देरी और वितरण प्रणाली में बाधाएं हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि जल्द ही क्षेत्र में यूरिया की आपूर्ति बढ़ाई जाएगी और किसानों को सहकारी समिति के माध्यम से उचित दर पर यूरिया उपलब्ध कराया जाएगा।

किसान संघ के प्रतिनिधि ने चेतावनी दी है कि यदि समस्या का समाधान समय पर नहीं हुआ, तो क्षेत्र के किसान आंदोलन और धरना-प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होंगे। उनका कहना है कि यह समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि किसान समुदाय की कृषि क्षमता और जीवनयापन से जुड़ी हुई है।