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Banswara कुंड से निकली माही, मिंडा से 35 किमी दूर सरदारपुर में बना नदी का पहला रूप

 

बांसवाड़ा न्यूज़ डेस्क, बांसवाड़ा माही बांध वागड़ की जीवन रेखा ही नहीं समृद्धि का भी प्रतीक है। आज बिजली उत्पादन के क्षेत्र में भी बांसवाड़ा का नाम अग्रणी है और इससे प्रदेश के कई जिलों को राशन मिल रहा है। दैनिक भास्कर की टीम बांसवाड़ा से 220 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश में विंध्याचल की पहाड़ियों के बीच बसे धार जिले के मिंडा गांव में यह जानने पहुंची कि माही नदी का उद्गम कहां और कैसे हुआ, किस स्थान पर माही ने पहली बार नदी का रूप धारण किया। माही सबसे पहले मिंडा गांव में ही खिले। माही ने यहां छोटे-छोटे तालाबों का रूप धारण कर लिया और मिंडा से करीब 35 किमी दूर सरदारपुर बांध तक जमीन के नीचे पहुंच गई। यहां नदी का रूप धारण कर बांसवाड़ा के माही बांध तक माही समृद्धि की धारा बहा रही है। माही नदी के पानी से वागड़ में 1.5 लाख हेक्टेयर में फसल पैदा होती है। जिससे रोजगार के साधन भी बढ़े और रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने वाले लोगों का पलायन भी रुका। माही डैम की आधारशिला 1967 में रखी गई थी, जो 1984 में बनकर तैयार हुई। जिले में ढाई हजार किमी नहर भी बनी। माही विभाग के इंजीनियरों के मुताबिक माही बांध और नहरों पर करीब 100 करोड़ रुपये खर्च किए गए जो 1984 में बनकर तैयार हुए। माही परियोजना राजस्थान और गुजरात सरकार के सहयोग से बनाई गई है। 1984 में पहली बार माही बांध का पानी नहरों से सिंचाई के लिए छोड़ा गया। यहीं से बांसवाड़ा की किस्मत बदलने लगी थी मंदिर से करीब 1 किमी दूर खेत में एक प्राचीन कुंड है। जहां से माही नदी पहली बार निकल रही है। इस कुंड से महज 50 मीटर की दूरी पर माही तालाब का रूप धारण कर रहा है। इस गांव में कई छोटे-छोटे तालाब हैं। लेकिन माही फिर भी नदी के रूप में प्रकट नहीं हुई। इस पर दोबारा हमारे सवाल पूछने पर पुजारी जी ने बताया कि यह गांव ऊंचाई पर है। यहां के तालाब का पानी जमीन के नीचे बहकर नदी का रूप ले लेता है।

गांव से थोड़ा आगे स्टाफ डैम बनाया गया है, जहां तालाबों का पानी पहुंच रहा है। हम उस स्टाफ डैम तक पहुंचे लेकिन वहां भी माही नदी के रूप में नजर नहीं आ रही थी। वहां जमीन के नीचे ऊंचाई से बहता पानी जमा हो रहा था। हमें बताया गया कि माही को नदी के रूप में देखने के लिए हमें 35 किमी आगे सरदारपुर जाना होगा। इस पर हमारी टीम सरदापुर के लिए रवाना हुई, जहां माही का पहला रूप नदी के रूप में नजर आया माघ शुक्ल बीज माही माता की जयंती मिंडा गांव में मनाई जाती है। इस दिन माही माता की पूजा की जाती है और महाआरती की जाती है। मंदिर परिसर में मेला लगता है। इसमें राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। हर साल माही माता की पंचकोसी पदयात्रा माघ शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक निकाली जाती है। जो मूल स्थान से गोलपुरा, बिछिया, बरोदिया, भोपावर, पातालवडिया, सरदारपुर, नरसिंग देवला, बोला, ऐमन, लबरिया, श्रृंगेश्वर धाम होते हुए वापस पूर्णिमा के दिन मिंडा गांव आती है। मिंडा में माही माता के दो मंदिर हैं। एक पहाड़ी पर और दूसरा गांव में। मंदिर को गुजरात के रेबारी गुर्जर समाज और मिंडा गांव के ग्रामीणों के सहयोग से पहाड़ी पर बनाया जा रहा है। वर्ष 1975 में गांव के मुखिया (पटेल) 90 वर्षीय रामरतन देवड़ा ने अपने पिता तोलाराम देवड़ा की याद में बनवाया था। मंदिर के पुजारी कन्हैयादास वैष्णव का कहना है कि गुजरात का रेबारी गुर्जर समुदाय माही माता को कुलदेवी मानता है। इसलिए मिंडा में पहाड़ी पर रेबारी गुर्जर समाज के सहयोग से करीब 2 करोड़ की लागत से भव्य मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है.