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Banswara कैंसर को हराकर सच में बने शिव, अब दूसरों को सिखा रहे सीख

 

बांसवाड़ा न्यूज़ डेस्क, बांसवाड़ा 68 साल की उम्र में जहां विकलांगता हावी है, उस दौर में कैंसर के जहर को हरा दें। पहले पीड़ित पत्नी की देखभाल करके और फिर छोटे-छोटे प्रयासों से घर चलाने का ख्याल रखकर अन्य कैंसर रोगियों का मनोबल बढ़ाने का जुनून। कहानी बांसवाड़ा के शिवराम मेहता की है, जो जीवन शक्ति और संघर्ष के जरिए खुद को शिव साबित करते नजर आते हैं। प्लास्टिक के घरेलू सामानों के व्यवसायी शिवराम बेझिझक बताते हैं कि इसमें क्या छिपाना है। बस की सवारी हो या अस्पताल में रूटीन चेकअप के लिए, मैं अन्य मरीजों को भी यही बताता हूं। मत डरो। डरो कि तुम नहीं जीतोगे। आंतरिक शक्ति को जीवित रखें और लड़ें, शरीर की ताकत फिर आएगी।

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1984 में बांसवाड़ा आए मूल आसपुर क्षेत्र के मेहता शहर के नए बस स्टैंड पर बस गए, जब दुकान का कारोबार अच्छा चला। पहला झटका 2017 में आया, जब पत्नी मोतीदेवी ने पत्थरों की शिकायत की। जब परीक्षण किया गया, तो डॉक्टर को गर्भाशय में एक गांठ के कारण कैंसर का संदेह हुआ। ऑपरेशन करवाया। वह पूरी तरह से ठीक नहीं हुई थी कि 2018 में उसे खुद भी दांत निकलने की समस्या थी। जांच में पता चला कि यह मुंह का कैंसर है। तब इकलौता बेटा भी बेरोजगार हो गया और उसका मूड भी खराब हो गया। उदयपुर-अहमदाबाद में इलाज पर लाखों रुपये खर्च किए गए। थोडा अशांत भी, लेकिन जीवन है तो संसार है। जब कोविड में भी धंधा मंदा हुआ तो उसने कारोबार बेचकर लाखों जुटाए और पत्नी के दम पर खर्च कर दिया। इसी का नतीजा है कि दोनों ने कैंसर को मात दी है। अब सिर्फ दवाएं चल रही हैं। साल भर रूटीन चेकअप करवाते हैं और मस्त रहते हैं।

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